नारी  SANTOSH GUPTA

नारी

SANTOSH GUPTA

धर्म सभा थी मौन क्यों
हुए नही सब चौंध क्यों,
क्यों थी सभा में नीरवता
जब तड़प रही थी अस्मिता।
 

वनिता बनी तब दासी थी
एक निर्मम उदासी थी,
अग्नि की पुत्री छल से
बनी अभागन नारी थी।
 

औरत के जीवन की
एक विचित्र लाचारी थी,
धर्म में सब जकड़े थे
अधर्मी तब अकड़े थे।
 

एक स्त्री के स्त्रीत्व को
धन के तुले से तौले थे,
दुशासन के दुस्साहस पर
किसी ने मुख न खोले थे।
 

परमार्थ क्यों विवश हुआ था
अंतर्मन क्यों अंकुश हुआ था,
देखकर समक्ष विपल्व को
क्यों बाण रहित धनुष हुआ था।
 

कुलवधु का दासी बनना तो
दाव धर्म का फल कहलाया,
पर कैसा धर्म था वह,
जिसने जघन्य दुष्कर्म करवाया।
 

हुई पांचाली बस अधीन थी
पर क्यों भावनाएँ हुई हीन थी,
रख देते किसी कोने में महल के
पर, क्यों हुई सम्मान से दीन थी।
 

हस्तिनापुर के राज्य की
क्या दास प्रथा वही थी,
नारीत्व के विनाश को
रोकने की प्रथा नहीं थी।
 

धर्म के किस धागे ने
धर्मियों का मुँख सिल रखा था,
भरतवंश के वीरों ने
सीने में कैसा दिल रखा था।
 

हरण जब चीर हुआ था
क्यों नहीं मन अधीर हुआ था,
वो धर्म के रक्षक नहीं थे जो मौन थे
एक दासी के शीलभंग पर
नीरव हुए क्यों गंगापुत्र और द्रोण थे।
 

एक दासी ही थी द्रौपदी
पर, क्या दासी का सम्मान नहीं,
क्या दासी का स्वाभिमान नहीं,
क्या दासी के आत्मश्लाघा का
कुरूवंश में कोई मान नहीं।
क्या रानी ही बस नारी है,
क्या दासी एक नारी नहीं।

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