बुढ़ापा  SANTOSH GUPTA

बुढ़ापा

SANTOSH GUPTA

वह खुद से बार-बार पूछता है,
ये बुढ़ापा आखिर क्यों आता है,
खुद का ही शरीर बोझ क्यों बन जाता है।
 

जीवन चक्र की बिडंम्बना कैसी है,
जवानी लगा देते है जिसके बचपन में,
वही जवान होकर अपना बचपन कैसे भूल जाता है।
अंगुलियाँ पकड़कर चलना जो सीखते थे,
वही भला कैसे साथ छोड़ जाते हैं।
 

कभी जिसके बालों को पकड़कर खेला करते थे,
उन्हीं बालो के रंग बदलते ही, क्यों बदल जाते हैं।
 

आँसू की एक बूँद से पहले
हर जिद्द पूरी करता था जो,
पीड़ा के सागर के जल को आँखो में अब छिपाता है।
 

हाथी, घोड़े, गाड़ी, जहाज न जाने
कौन-कौन से खिलौनों से वह उसके लिए घर सजाता था,
अब तो वह एकांतवास में ही रह जाता है।
 

अपने पराए की कशमकश में
बुढ़ापे को बुढ़ापा ही समझ पाता है,
बचपन, जवानी तो सब पराए होते हैं,
मौत के वक्त बस यह बुढ़ापा ही रह जाता है।

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