मैं मजदूर मेरा दुख ना कोई सुनने पाया  अंजना कुमारी झा

मैं मजदूर मेरा दुख ना कोई सुनने पाया

अंजना कुमारी झा

मैं मज़दूर मेरा दुख ना कोई समझ पाया,
राजनीति के गंदे खेल में मेरी आह! ना कोई सुनने पाया।
नंगे ही चल पड़े थे कदम तपती सड़कों पर,
उन जलती चमड़ियों पर मरहम ना कोई लगाने पाया,
मैं मज़दूर मेरा दर्द ना कोई सुनने पाया।
 

मेरा दोष सिर्फ इतना था पॉकेट में पैसा ना था,
सड़क पर चलाने को महँगी कार ना थी,
रहने को अट्टालिका ना थी।
इसलिए दर्द भरी आह! तुझ तक ना पहुँच पाई,
और तेरे किये हुए वादे हम तक ना पहुँच पाए,
मैं मज़दूर मेरा दर्द ना कोई सुनने पाया।
 

खाली पेट ही निकल पड़ा था मैं,
ना था तन पर कपड़ा, ना था बॉटल में पानी,
ना था साहस कुछ करने का,
बस खाली सड़कों को माप रहा था मैं बेसुध खड़ा,
मैं मज़दूर मेरा दर्द ना कोई सुनने पाया।
 

बस एक ही रात में मालिक ने फरमान निकाला,
कल से ना आना कह कर बाहर निकाला।
उन भूखे बच्चों को अब क्या खिलाऊँगा?
घर वापिस जा कर मैया को क्या मुँह दिखाऊँगा?
मैं मज़दूर मेरा दर्द ना कोई सुनने पाया।
 

ऊँचे पद पर आसीन बड़े लोग
कभी तो हमारी भी आह! सुन लो,
अब बन्द करो राजनीति का गन्दा खेल
हमारा भी उद्धार कर दो,
मैं मज़दूर मेरा दर्द ना कोई सुनने पाया।
 

ये ना कभी भूलना, जिस महल में रहते हो
उसकी नींव हमने ही बनाई है,
कंकड़-पत्थर उठाते हुए
अपनी कई रातों की नींद गँवाई है,
मैं मज़दूर मेरा दर्द ना कोई सुनने पाया।
 

आज जब वक़्त है हमारा साथ देने का,
तो हर रोज़ नए-नए भाषण दे अपनी जेब भरते हो,
झूठे आश्वासन दे विपक्षी दलों के साथ वाद-विवाद करते हो,
मैं मज़दूर मेरा दर्द ना कोई सुनने पाया।
 

फैली इस माहामारी में कदम मेरे भी काँपते हैं,
तो बाट जोहती मुन्नी की माँ की याद आज भी आती है।
कहीं ये यात्रा मेरी आखिरी यात्रा ना हो जाए,
बस इसी सोच में मेरी हर रात दहशत में गुज़र जाती है।
और हर नया सवेरा अपनों से मिलने के आस की
रोज़ एक नई दस्तक ले कर आता है,
मैं मज़दूर मेरा दर्द ना कोई सुनने पाया,
मेरे दुख का ईलाज ना कोई कर पाया।

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