तेरी परछाई  MANAS Kumar JHA

तेरी परछाई

MANAS Kumar JHA

रात की गहराई में, गूँजते सन्नाटे,
आहट किसी अजनबी की,
चहुँ ओर देखा, आहट थी मेरी परछाई की।
 

खुले गगन में बैठा,
चाहत थी सितारों का साथ हो,
सितारा दूर कहीं व्यर्थ ही खोया था
गैर की परछाई में।
 

बेचैन करती तेरी खामोशी,
सवालों से घिरा मेरा मन
बस साथ है तेरी परछाई की,
जिसकी ना ख्वाहिश है ना टूटने का है डर।
 

भय व्याप्त है, संकेत है उजाला होने का
स्वरूप बदलती परछाई,
मशगूल है अवतरित होने को।
 

तल्लीन मन खुशियों से सराबोर है,
बेताब है एक झलक पाने को,
आतुर है एक ख्वाब हकीकत बनने को,
विचलित हूँ कहीं डूब न जाऊँ।

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