मैं  Anupama Ravindra Singh Thakur

मैं

Anupama Ravindra Singh Thakur

जमाने भर की बुराईयाँ हैं मुझ में,
पर किसी को गिराकर
ऊपर नहीं है जानाम,
किसी को नीचा दिखा कर
खुद का मान नहीं है बढ़ाना।
 

जमाने भर की बुराईयाँ हैं मुझ में,
पर किसी को धोखा देकर
लाभ नहीं है पाना,
किसी को हानि पहुँचा कर
धन नहीं है जुटाना।
 

जमाने भर की बुराईयाँ हैं मुझ में,
पर किसी के पीठ पीछे
बुराई नहीं है करना,
स्पष्ट वक्ता बन
चाहे पड़े किसी का दिल तोड़ना।
 

जमाने भर की बुराईयाँ हैं मुझ में,
पर कभी झूठ का सहारा नहीं है लेना,
सच्चाई और नेकी से
जीवन में आगे है बढ़ना।
 

जमाने भर की बुराईयाँ हैं मुझ में,
पर सर झुका कर नहीं है जीना,
सर उठाकर स्वाभिमान से
मंजूर है मरना।
 

जमाने भर की बुराईयाँ हैं मुझ में,
पर किसी की चुगली कर
खुद की जगह नहीं है बनाना
ऐसी ऊँचाइयाँ नहीं है पाना।
 

जमाने भर की बुराईयाँ हैं मुझ में,
पर दूसरों की कामयाबी से
नहीं है जलना,
दूसरों से तुलना कर
मन नहीं है दुखाना।
 

जमाने भर की बुराईयाँ हैं मुझ में,
पर कामचोर नहीं है बनना,
मेहनत से प्राप्त कमाई से ही
है जीवन-यापन करना।
 

जमाने भर की बुराईयाँ हैं मुझ में,
पर गद्दार नहीं है बनना,
सच्चा नागरिक बन
देश को आगे है बढ़ाना।

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