कोरोना में पढ़ाते शिक्षक  Anupama Ravindra Singh Thakur

कोरोना में पढ़ाते शिक्षक

Anupama Ravindra Singh Thakur

कोरोना काल का शिक्षक
होने का
सौभाग्य मिला है,
पढ़ाने का अनोखा ढंग
सीखने को मिला है।
 

मुँह पर नकाब लगाया है,
ऊपर से प्लास्टिक की ढाल
को सिर पर चढ़ाया है,
पुस्तक हाथ में उठाया है
नकाब के पीछे से ही
खुद का वॉल्यूम बढ़ाया है,
तभी
साँसों से निकलती भाप को
चश्मे पर जमा पाया है।
 

कोरोना काल का
मेहनती शिक्षक
अब यह सोच चकराया है,
प्लास्टिक ढाल के अंदर
यह कैसा कोहरा छाया है!
क्यों यह धुंधलापन
हर तरफ नज़र आया है?
 

पुस्तक में से अक्षर हुए गायब
कहीं कुछ दिख न पाया है,
आँखें फाड़-फाड़ कर देखा
पर कुछ भी नज़र नहीं आया है।
 

फिर बच्चों की ओर मुँह घुमाया
कौन है राम?
कौन है शाम?
बस भ्रम ही भ्रम छाया है,
दिमाग पर बहुत जोर है लगाया
पर कुछ भी समझ में न आया है।
 

आवाज़ किसी को लगाई
तो जवाब कहीं से पाया है,
हे ईश्वर यह कैसी विडंबना,
यह कैसा जाल बिछाया है?
मन ही मन बड़बड़ाता
कोरोना काल का शिक्षक
कुछ क्षण अवश्य हडबडाया है।
 

फिर
अपने आप को संयत कर
खुद का वॉल्यूम बढ़ाया है,
ढाल पर पड़ी धुंध को हटाकर
मंद-मंद मुस्काया है,
कोरोना काल का शिक्षक
हर परिस्थिति से लड़ता
परेशानियों में भी
नई राह बनाता है।

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