अंदर कुछ और बाहर कुछ  Abhishek Pandey

अंदर कुछ और बाहर कुछ

Abhishek Pandey

बाहर कितनी चहल पहल,
जगमगाती टिमटिमाती बत्तियाँ,
आकाश तक उठता शोरगुल,
तन पर सुन्दर वस्त्र, आभूषण,
चेहरे पर बनावटी मुस्कान,
पर अंदर एक नीरस चुभता मौन,
मन के कोने-कोने में भरा अंधेरा,
निष्ठुर कुरूपता,
कलेजे को छेद देने वाली व्यथा।
यह सब ऐसा है मानो
जैसे सागर के तल पर शांति,
गहराई में अनेक हलचलें,
घात - प्रतिघात।
मजबूरी कहूँ या डर,
क्यों मैं अंदर वाले को बाहर नहीं आने देता?
शायद इसलिए क्योंकि अगर ऐसा हुआ,
तो मैं बचूँगा अकेला, एकदम अकेला।
और परिणाम -
रिश्तों की डोरें हिल जाएँगी,
मेरा सारा कुछ जिसे मैं "मैं" कहता हूँ,
समाप्त हो जाएगा,
फिर शुरू करनी होगी,
तलाश एक नई पहचान की।

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