मित्र मेरे  Kaushik Kashyap

मित्र मेरे

Kaushik Kashyap

मेरे मित्र तुम ये
किस गति में फँस गए,
गए कमल को तोड़ने
कीचड़ में हो धँस गए।
 

दूसरे का रक्त जो
तुम पोंछने चले गए,
कि खुद रिस-रिसाओ
से तुम रक्त रिक्त हो लिए।
 

दिन गया निशा हुई
खुद बलि चढ़ाते हो,
तुम क्या करने को आए थे
और ये क्या करते जाते हो।
 

हाथ गले में डाल कर
जो पाठ हमें पढ़ाया था,
वह साम्यवाद और समाजवाद
सब मुझे रटाया था।
 

खुद उसी प्रवचन को भूले
आज तुम हट लिए,
जो रास्ते में मैं दिखा
दूसरी ओर सट लिए।
 

कि क्या हुआ जो चंद तुम
ठोकरों से भिड़ गए,
और क्या हुआ जो चले
दो कदम में गिर गए।
 

चले सही इस बात का
दम तो भर सकेंगे हम,
कुछ ना हुआ तो आगे
शौक से मरेंगे हम।

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