पिता  SANTOSH GUPTA

पिता

SANTOSH GUPTA

प्रज्ज्वलित कर दीपक तुम्हारा
जो तेल बनकर जलता है,
जिन शाखों से तुम्हारे जीवन का
फूल सुंदर खिलता है,
जिन रागों से तुम्हारे जीवन का
संगीत मनोहर बजता है।
 

जिन धागों से तुम्हारे जीवन का
पतंग ऊपर उड़ता है,
शुष्क नयनों से रो कर जो
संताप अपना छिपाता है,
मौन रहकर पीड़ा अपनी जो
बस स्वयं को ही बतलाता है।
 

खुद को भी बेचकर जो
खिलौने घर लाता है,
तकलीफों की जो बारिश हो
सर पर छाता बन जाता है,
समस्याओं की धूप में
छाँव जो बन जाता है।
 

हमारे जीवन की नाव हो पार
दाँव पर लग जाता है,
कोमल पैर रहे हमारे
खुद की एडियाँ घिस जाता है,
पिता वही कहलाता है,
पिता वही कहलाता है।

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