संवेदना  Rakesh Rajgiriyar

संवेदना

Rakesh Rajgiriyar

क्या कहूँ मैं
कथा भारत के भाग्य की,
गर्व था कभी अपने अभिमान की,
ख़तम हो गया सब
रही नहीं किसी से यारी,
तड़प-तड़प के मर रहे थे।
देख हृदय तनिक नहीं घबराया,
माँ का आँचल, खेत खलिहान,
बाजार और दूकान,
रंज मात्र भी शिकन नहीं उभर पाया
ये कैसी सत्ता की लालसा।
अपनों ने अपनों को ही मरवाया,
ऑक्सीजिन के लिए भटक रहे थे,
ट्विंकल-ट्विंकल कहने वाले बच्चे
कैमरे के आगे सिसक रहे थे।
लोरी गा के सुलाएगा
और कौन बाजार ले जाएगा,
बचा लो मेरे मम्मी पापा को अंकल
तब ये चौथे स्तम्भ की भी आँखे नहीं सूजी थी।
ब्रेकिंग न्यूज़ दिखा-दिखा के
खूब वाहवाही लूटी थी,
डिबेट में बैठे लोग ज्ञान देते रहे
तरह-तरह के वेरिएंट बता
अपनी टी०आर०पी० बटोरते रहे।
जमाखोरों के भी जादुई रंग गजब के दिखे,
आपदा में अवसर कोई इनसे सीखे,
क्या विपक्ष, क्या मीडिया
सबने अपनी रोटियाँ सेकीं।
कुछ देवदूत बन लोगों को बचा रहे थे,
कुछ अपनों से भी घबरा रहे थे,
कहाँ गई वो संवेदना और सोच
जब अपनों की लाशों को भी कुत्ते रहे थे नोच।
न जाने कितनी लाशों को माँ गंगा में बहाया था,
क्रूरता भी घबरा गई
जीवनरक्षकों ने जब कफ़न को भी उड़ाया था।
ये कैसी मौत थी, जिसने अपनों को भी भुलाया था,
बच्चे भूख से तड़प रहे थे,
कौन इनकी सुधि लेता
माँ बाप तो दूसरे कमरे में
न जाने कितने दिनों से सड़ रहे थे।
अतिथि देवो भव हमें सिखाया था
हे मानस,
क्या हुआ जो मन मेरा
ये देख कुछ अधिक घबराया था।

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