पापा! तुमसे सीखा था  SANTOSH GUPTA

पापा! तुमसे सीखा था

SANTOSH GUPTA

हठी था शिशुपन में जब
धैर्य तुमसे सीखा था,
तुम बनते खिलौने मेरा
तब खेल मैंने सीखा था।
 

तुम थामे थे हाथ, तब
चलना मैंने सीखा था,
स्कूल तो जाता था पर
पढ़ना तुमसे सीखा था।
 

लिखता हूँ आज जो, वो
क-ख-ग-घ तो तुमसे सीखा था,
रखता हूँ हिसाब खूब
ल.स.- म.स. तो तुमसे सीखा था।
 

बोलता हूँ आज बहुत, पर
भाषा तो तुमसे सीखा था,
माँ तो आराम कराती थी
तुमसे तो श्रम सीखा था।
 

जीवन चक्र के घूर्णन का
बदलता हर क्रम सीखा था,
तुम्हारे टूटे चप्पल के सिलते धागों से
अपने जूते का मोल सीखा था।
 

तुम्हारे बहते पसीने की बूंदों से
मेहनत का नमकीन घोल सीखा था,
श्वान सा सोना सीखा था
शुष्क नयनों से रोना सीखा था।
 

आठ आने के जेब खर्च से
पैसे बचाना तुमसे सीखा था,
चिंतित चित्त में चेहरे से
मुस्कराना तुमसे सीखा था।
 

तुमसे ही सीखा था
पौधों के नीचे जड़ होता है,
तुमसे ही सीखा था
क्या नींव का पत्थर होता है।
 

आने वाले कल के लिए
गुजरा हुआ कल सीखा था,
जल से भरे कुएँ के लिए
खुदा हुआ तल सीखा था।
 

निराशा में मनोबल सीखा था
हिम्मत का कौशल सीखा था,
धूप और छाँव में
भेदभाव नहीं सीखा था।
 

लिप्सा और चाह में
कभी चाव नहीं सीखा था,
शौक बहुत थे जीवन में
संतोष तुमसे सीखा था।
 

दृढ़ता संकल्प की और
जोश तुमसे सीखा था,
कठोरता सीखा था
तरलता भी सीखा था।
 

जटिलता तुमसे सीखा था
सरलता भी सीखा था,
घर ही तीरथ है, तुमसे सीखा था
कर्म ही वंदन है, तुमसे सीखा था।
 

जिम्मेदारी का बोध तुमसे सीखा था
कर्तव्यों का शोध तुमसे सीखा था,
राम-कृष्ण की कहानियाँ सीखा था
धर्म-अधर्म की निशानियाँ सीखा था।
 

तुमसे स्वाभिमान सीखा था
तुमसे आत्मसम्मान सीखा था,
जीवन की आपाधापी में
पापा! तुमसे संग्राम सीखा था,
जीने की शैली और
जीवन का निर्माण सीखा था।

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