ये धुआँ-धुआँ सा  VIMAL KISHORE RANA

ये धुआँ-धुआँ सा

VIMAL KISHORE RANA

ये धुआँ-धुआँ सा गम होता जा रहा है,
वो नशा-नशा सा कम होता जा रहा है,
ज़िंदगी के प्याले में जो जाम सजाया हमने,
वो जाम भी अब खत्म होता जा रहा है।
 

यह हवा-हवा थमती जा रही है,
यह घटा-घटा ढलती जा रही है,
कल जो फ़िज़ा उभरती सी लगती थी,
वो फिजा-फिजा छटती जा रही है।
 

ये नज़र-नज़र खुलती जा रही है,
ये अगन-अगन जलती जा रही है,
मरुस्थल में जो कलियाँ खिलाईं हमने,
वो ज़रा-ज़रा मरती जा रही हैं।
 

वो समय-समय आता जा रहा है,
अंधेरा-अंधेरा सा छाता जा रहा है,
जो खुशियों के सहारे जलाया हमने,
वो दीया-दीया बुझता जा रहा है।
 

ये मन-स्वप्न टूटता जा रहा है,
ये मन-अन्तर्मन डूबता जा रहा है,
जो हाथ-साथ हाथों में लिया,
वो हाथ-साथ छूटता जा रहा है।
 

मैं धीरे-धीरे जलता जा रहा हूँ,
मैं थोड़ा-थोड़ा पिघलता जा रहा हूँ,
क्या हो रहा, क्या होगा, पता नहीं,
बस अंदर-अंदर घुटता जा रहा हूँ।
 

फिर आगे चलकर सब लुप्त हो जाएगा,
जज़्बातों का ज्वालामुखी सुप्त हो जाएगा,
हम सब समाकर पत्थर बन जाएँगे,
सब धुँधला-धुँधला गुप्त हो जाएगा।

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