छलावा  Anupama Ravindra Singh Thakur

छलावा

Anupama Ravindra Singh Thakur

कैसे उबरें
जब अपनों से ही धोखा मिलता है,
अपने ही म्यान का खंजर
अपने ही छाती में घुसता है।
 

प्राणों से भी अधिक
जिस पर हमने प्यार किया,
उसके ही चोटों ने
घायल हमें बार-बार किया।
 

उसे कहाँ अब फुर्सत है
आज हम से बतियाने की,
जिसे कभी
हमारे पीछे-पीछे चलते
दुनिया ने देखा है।
 

खुशकिस्मत समझते थे वे
कभी अपने आपको
हमें पाकर,
चल देते हैं वे ही आज
हमसे नज़रें अपनी बचाकर।
 

प्यार, इश्क, मोहब्बत
बस एक छलावा है,
समय के साथ-साथ
सब कुछ मिट जाना है।

अपने विचार साझा करें




0
ने पसंद किया
60
बार देखा गया

पसंद करें


  परिचय

"मातृभाषा", हिंदी भाषा एवं हिंदी साहित्य के प्रचार प्रसार का एक लघु प्रयास है। "फॉर टुमारो ग्रुप ऑफ़ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग" द्वारा पोषित "मातृभाषा" वेबसाइट एक अव्यवसायिक वेबसाइट है। "मातृभाषा" प्रतिभासम्पन्न बाल साहित्यकारों के लिए एक खुला मंच है जहां वो अपनी साहित्यिक प्रतिभा को सुलभता से मुखर कर सकते हैं।

  Contact Us
  Registered Office

47/202 Ballupur Chowk, GMS Road
Dehradun Uttarakhand, India - 248001.

Tel : + (91) - 7534072808
Mail : info@maatribhasha.com