किताबों में हूँ  SANTOSH GUPTA

किताबों में हूँ

SANTOSH GUPTA

किताबों में हूँ, अख़बारों में हूँ,
अब तक तो मैं बस विचारो में हूँ,
छोड़ दिए हैं जिन्हें सब बेघर
हाँ, मैं भी उन्ही बेसहारों में हूँ।
 

मेरे होने की जगह खंडहर हैं पड़ी,
अपने असली जगह से किनारो में हूँ,
न पक्ष में हूँ, ना विपक्ष में हूँ,
उनके बीच खड़ी दीवारों में हूँ।
 

न इस छोर मैं हूँ, न उस ओर मैं हूँ,
बेबस लाचार कमजोर में हूँ,
बस बातो में हूँ, विवादो में हूँ,
झूठे इरादो में हूँ, टूटे वादो में हूँ।
 

देखो मुझे, मैं किस क्रम में हूँ,
मैं शायद तुम्हारे भ्रम में हूँ,
जाना नहीं, मेरे सही जगह को,
दिन-रात मैं बस इसी गम में हूँ।
 

इतिहास के पन्नों में उलझा हुआ हूँ,
एक दीपक सा मैं बुझा हुआ हूँ,
सूख रहा हूँ, मुझे फिर से बहा लो,
अपने हृदय में मुझे फिर से बसा लो।
 

चाहते हो तुम एक राष्ट्र बनाना,
मेरे बिना तुमने कैसे ये माना,
परम्परा, धर्म, जातिवाद से पहले
मन में अपने, तुम मुझे समाना।
सुखद, समृद्ध देश का साध मैं हूँ,
सिसकता, विलकता राष्ट्रवाद मैं हूँ।

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