छिटका उजियारा  SMITA SINGH

छिटका उजियारा

SMITA SINGH

कार्तिक मास और दीपावली
अंधियारे में दीपों की लड़ी,
चमक रहा सारा संसार
छिटका उजियारा गली-गली,
क्यों है आज भी मेरी वीरान झोंपड़ी
अंधियारे में सूनी पड़ी?
 

सामने मेरी झोपड़ी के था
बड़ा सा भव्य सुसज्जित भवन,
मनभावन दिख रहा था नज़ारा
कोने से आती चौंधियाती रोशनी,
ज़ोर की खिलखिलाकर मेरे कानों में पड़ी।
 

क्यों ऐसी दुनिया है यह
हर किसी को सिर्फ अपनी ही पड़ी,
भेदभाव, अमीरी-गरीबी
बनाई यह रीत इंसान ने,
हो नहीं सकती ईश्वर की मर्जी।
उसने तो इंसान बनाया
हम सब मूर्ख प्राणी,
अनवरत आलाप रहे एक ही राग
कैसे भरूँ तिजोरी बड़ी।
 

उन्हें सिर्फ अपनी ही पड़ी!
देखा सामने तब नज़र पड़ी,
लोग जला रहे थे फुलझड़ी।
झाड़ फानूस, साज सजावट
स्वप्न में बस देखा था,
सिर्फ एक दिया जलाने को भी
क़िल्लत तेल की आन पड़ी।
 

अनायास ताली की खनक
कानों में मेरे आन पड़ी,
देखा छोटे नन्हे बच्चों को
चेहरे पर थी मुस्कान बड़ी।
 

एक दिए की बत्ती और
पानी में कुछ तेल की बूँदें,
एक दिया कैसे भी जलाया
उसमें भी बच्चे थे खुश,
एक दिया मेरा जल रहा था
किलोल बच्चों का मन कर रहा था।
खुशियाँ चेहरे पर थी उनके
उन्हें मतलब क्या झाड़ फानूस से,
उन्हें तो रोशनी की पड़ी,
खुश इन बच्चों को देखकर
बूँद आँसू की झड़ पड़ी।
 

क्या कोई बुरा कर्म था मेरा
जिसकी है ऐसी परिणति,
एक दिया जलाने को बूँद
आँखों से निकल पड़ी।
कितने अबोध होते हैं बच्चे,
ख़ुशी देख उन नन्ही आँखों में
दुख में भी सुख की बरसात पड़ी।
 

बंदे चाहे ईश्वर पूजे
या पूजें अल्ला या अली,
जिनको फ़िकर है अपनेपन की
मना रहे मिल कर
दीपावली।
जात-पात, अमीर-गरीब
करते वही
जिनके मन में बड़ी सी खरोच,
त्योहार पर व्यवहार ऐसा करते वही लोग
जिनकी होती छोटी सोच,
रहे अपने बंद कपाट में
उन्हें मुबारक उनकी गली,
चलो मिलें हम इन लोगों से
प्रतीत हो जो अपने से
चलो मनाएँ दीपावली।
 

रोशनी से चकमक दीवाली,
रिश्तेदारियाँ निभाने का नाम दीवाली,
कामना मेरे मन की है यह
मिलें सभी से सौहार्द पूर्वक
मनाएँ असली दीपावली।

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