बहेलिया  SMITA SINGH

बहेलिया

SMITA SINGH

एक कहानी जो सुनी मैंने बचपन में
बहेलिया आएगा तुमको हर ले जाएगा,
कभी ना फँसना बहेलिये के प्रेमानुभूति
कृत्रिम प्रेम वाण भरे दाने संग छल
दाने संग फेंके गए तिलस्मी जाल में।
 

यह थी छोटी चिड़िया की कहानी
अब तो इंसान भी फँस रहे तिलस्मी जाल में,
जब थोड़ी बड़ी हुई तब मुझे यह अहसास हुआ,
ऐसा लगने लगा
जैसे लोगों को पहचान गई।
 

कहाँ पता था मुझको
लोगों का फैलाया मायाजाल,
मैं तो भोली भाली थी
छोटी चिड़िया जैसी ही थी,
बेज़ुबान चिड़िया थी मुझसे बेहतर
छली गई मैं, जिसके पास ज़ुबान थी।
 

भर जाती है आँखें मेरी
जब पीछे मुड़कर देखती हूँ,
रिश्ते बने और जुड़ गए थे उन सब से
मन मस्तिष्क जब मिल गए थे उन से,
हँसी ठिठोली में वक़्त बीतता रहा,
जीवन लग रहा था सरल
अनायास जो बन गया था सख़्त,
क़रीब बने वही रिश्ते
जब बुनते रहे कई प्रपंच।
 

चलो भूल जाने की नाकाम कोशिश
करते हैं एक बार फिर,
याद रखते हैं बस एक ही बात
मन से मन जब मिल गए थे
तभी रिश्तों में बँध गए थे,
भूल जाएँ उनके किए प्रपंच
याद रखे बस पुरानी यादें,
कुछ मीठी कुछ प्यारी सौग़ातें,
समझ जाएँ और मूक से हो जाएँ,
छोटी चिड़िया से बड़ी हाँ जाएँ।
 

रखें विश्वास खुद पर,
निस्वार्थ रूपी अहसास
आज यहाँ है,
काल का कल किसे पता बदल जाएगा
या शहर बदलेगा,
या फिर अलविदा दुनिया
कहने को कितना वक्त लगेगा।
 

कर्तव्य जीवन में निभाने की क़वायद
रिश्ते निभाने के क़ायदे
भूल जाते हैं किए लोगों के प्रपंच,
दिखाते हैं बस प्यार के रंग,
जीवन है तब लोग भी मिलेंगे,
उनकी भूल और किए प्रपंच,
ये है उनका ढंग।

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