मेरी सोच  Vibhav Saxena

मेरी सोच

Vibhav Saxena

मुझे अच्छा लगता है किसी के साथ ज़मीन पर बैठना भी,
मग़र कुछ लोग कहते हैं कि तुम्हारी तो कोई हैसियत नहीं।
 

मैं अक्सर रुक जाया करता हूँ किसी को परेशान देखकर,
तब वो कहते हैं दुनिया में इतनी सादगी भी अच्छी नहीं।
 

किसी ज़रूरतमंद के काम आकर मुझे खुशी मिलती है,
मग़र लोगों की नज़र में ये बेवकूफ़ी के सिवा कुछ नहीं।
 

मैं सोचता हूँ कि जहाँ तक हो सके दर्द मिटाऊँ औरों के,
तब वो कहते हैं कि आजकल भलाई का ज़माना ही नहीं।
 

मुझे शौक़ नहीं है महँगे कपड़ों मोबाइल और बाइक का,
मग़र लोग इसे छोटी सोच समझ लेते हैं कुछ और नहीं।
 

मैं हर किसी से रिश्ता बनाए रखने की कोशिश करता हूँ,
तब वो कहते हैं कि दुनिया में पागलों की कोई कमी नहीं।
 

मुझे कोई तकलीफ़ नहीं होती है उन लोगों की बातों से,
मग़र मुझे लगता है कि उनकी सोच मेरे जैसी क्यों नहीं?
 

क्या मिल जाता है लोगों को यूँ ख़ुदगर्ज बनकर जीने से,
हो सकता है वो सही हों पर ग़लत तो शायद मैं भी नहीं।

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