इंसान परेशान बहुत है!  Rakhi Jain

इंसान परेशान बहुत है!

Rakhi Jain

कभी-कभी यूँ ही ख्याल आता है,
अच्छी थीं वो पगडंडी अपनी
अब सड़कों पर तो जाम बहुत है,
फुर्र हो गई फुर्सत अब तो
लोगों के पास काम बहुत है।
 

नहीं ज़रूरत घर में बूढ़ों की अब
हर कोई बुद्धिमान बहुत है,
उजड़ गए सब बाग-बगीचे
दो गमलों में ही अब शान बहुत है।
 

मट्ठा, दही नहीं खाते हैं अब
कहते हैं ज़ुकाम बहुत है,
पीते हैं जब चाय तब कहीं
कहते हैं आराम बहुत है।
 

बंद हो गई चिट्ठी, पत्री
फोनों पर पैगाम बहुत है,
आदी हैं ए०सी० के इतने
कहते बाहर घाम बहुत है।
 

झुके-झुके स्कूली बच्चे
बस्तों में सामान बहुत है,
सुविधाओं का ढेर लगा है
पर इंसान परेशान बहुत है।

अपने विचार साझा करें




1
ने पसंद किया
404
बार देखा गया

पसंद करें

  परिचय

"मातृभाषा", हिंदी भाषा एवं हिंदी साहित्य के प्रचार प्रसार का एक लघु प्रयास है। "फॉर टुमारो ग्रुप ऑफ़ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग" द्वारा पोषित "मातृभाषा" वेबसाइट एक अव्यवसायिक वेबसाइट है। "मातृभाषा" प्रतिभासम्पन्न बाल साहित्यकारों के लिए एक खुला मंच है जहां वो अपनी साहित्यिक प्रतिभा को सुलभता से मुखर कर सकते हैं।

  Contact Us
  Registered Office

47/202 Ballupur Chowk, GMS Road
Dehradun Uttarakhand, India - 248001.

Tel : + (91) - 8881813408
Mail : info[at]maatribhasha[dot]com