इंसान को इंसान में इंसान नहीं दिखता Sunil bansal
इंसान को इंसान में इंसान नहीं दिखता
Sunil bansalलूट मची है चारों ओर, क्या शहर क्या संसद,
गरीब को पानी भी नहीं, क्या सागर और क्या पनघट।
चुनाव आया, वादे करो, भोली जनता को बहलाओ, कुर्सी पाओ,
चारों ओर मचा ये महँगाई का हाहाकार क्यों नहीं दिखता।
इनके बच्चे बाहर पढ़ें और विदेशों में परिवार रहे,
इनको वो सीमा पर मरता जवान क्यों नहीं दिखता,
कहीं पर सड़ रहा अनाज, तो कोई दाने-दाने को मोहताज
क्यों किसी को भूख से मरता, बेहाल इंसान नहीं दिखता।
नौकरियों के बदले हड़पी जा रही गरीबों की ज़मीनें
राजनीति में होता ये अँधा कारोबार क्यों नहीं दिखता,
किताबों और फीस का बढ़ता हुआ बोझ, ये स्कूल का निजीकरण,
क्यों देश में सब को शिक्षा का अधिकार नहीं मिलता।
क़र्ज़ के बोझ तले दबा हुआ अन्नदाता और वो
मजबूरी में आत्महत्या करता किसान क्यों नहीं दिखता,
गर्भ में मरती कन्याएँ, सड़कों पर परेशान महिलाएँ,
किसी को इंसान का इंसान पर होता, प्रहार क्यों नहीं दिखता।
ऊँची इमारतों की चकाचौंध में रहने वालों तुमको
झुग्गियों में ये टपकता आसमाँ क्यों नहीं दिखता,
इन इमारतों की ईंटों पर छींटे है किसी के खून के
धूप में पसीना बहाता एक मजदूर क्यों नहीं दिखता।
जानवरों की तरह कुचले जा रहे सड़कों पर लोग
फुटपाथ पर सोता बेघर इंसान क्यों नहीं दिखता,
भरते रहो तिजोरियाँ मगर, कहाँ है तुम्हारी इंसानियत
जिसको बगल में दर्द से तड़पता इंसान नहीं दिखता।
इस क़दर नफरतें फ़ैल रहीं है जग में हर तरफ
अब आँखों में किसी की प्रेम का प्रमाण नहीं मिलता,
कभी धर्म, कभी फिल्मों के प्रचार में हो रही भगदड़
मरते-कुचलते इंसान पर होता ये अत्याचार क्यों नहीं दिखता।
उद्योगों से साँठ-गाँठ में दिनों-दिन महँगी होती दवाईयाँ
पैसे की कमी में मरता बीमार इंसान क्यों नहीं दिखता,
भगवान का दर्जा दिया है डॉक्टरों को इस समाज ने
फिर भगवान को किसी के आँसुओं का सैलाब क्यों नहीं दिखता।
दिखावे और झूठी शानो-शौकत की खातिर
सौ-सौ पकवान बना कूड़ेदान में डालने वालों,
उसी कूड़े के ढेर से झूठन ढूँढ़कर खाते
बच्चों का भूखा पेट क्यों नहीं दिखता।
सोने चांदी में डूबे हो इस कदर, तुम्हें
किसी बदहाल का फटा परिधान क्यों नहीं दिखता,
अपने बच्चे, परिवार, दोस्त और रिश्तेदारों की पड़ी है
हो कोई देशभक्त, किसी को पूरा देश क्यों नहीं दिखता,
इंसान तुझे अपने परलोक का अंजाम क्यों नहीं दिखता,
ऐ इंसान, तुझे इंसान में, इंसान क्यों नहीं दिखता।
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यह कविता आज के समाज की विडंबनाओं और नैतिक पतन पर एक मार्मिक टिप्पणी है। इसका मूल विचार यह है कि भौतिकवाद, स्वार्थ और सत्ता की लालसा ने लोगों को इतना अंधा कर दिया है कि वे अपने आस-पास व्याप्त घोर अन्याय, गरीबी, पीड़ा और मानवीय दुखों को देखने में असमर्थ हैं। कवि लगातार यह प्रश्न उठाता है कि आखिर एक इंसान को दूसरे इंसान में मानवता क्यों नहीं दिखती।
