तकिए में दफ़्न सिसकियाँ  Anupama Ravindra Singh Thakur

तकिए में दफ़्न सिसकियाँ

Anupama Ravindra Singh Thakur

आज फिर उसका तकिया
उसके आँसुओं से गीला हो गया है,
उसकी प्रतिदिन की प्रतीक्षा–पीड़ा
केवल वही जानता है।
सिसकियों की वह धीमी सरसराहट—
बस वही पहचानता है।
 

इन सूनी, एकाकी रातों में
वही तो उसका संगी है,
वही तो उसके अश्कों को
खामोशी से पी जाता है।
कमरे की जगमगाती रौशनी,
रंग-बिरंगी चिकनी दीवारें,
मुलायम, कोमल बिस्तर—
सबके बीच
उसका वह भारी अकेलापन।
 

वह पूछती रही इन सबसे—
काश, तुम सब जीवित होते!
तो मैं यूँ जड़-सी न हो जाती,
अपने मन की सारी बातें
सीने में यूँ न दफनाती,
हर दिन अपनी सिसकियाँ
ताकिए में न छुपाती।
 

आज ज़िंदा लोग ही
दीवारों-से बेजान हो गए हैं,
घर में लोग तो हैं,
पर रिश्ते मर चुके हैं।
हर कोई अपने कमरे में दुबका,
मोबाइल की रोशनी में
नए रिश्ते गढ़ रहा है—
और पुराने, अपने ही
धीरे-धीरे बुझते जा रहे हैं।

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