लिखो, बच्चों, लिखो! Sunil bansal
लिखो, बच्चों, लिखो!
Sunil bansalबहुत कुछ सोचते है बच्चे
बस कुछ बोलते कम हैं बच्चे,
देखो इनके चेहरे को ध्यान से
होते हैं ये मन के बहुत सच्चे।
ये क्या सोचते हैं हमे कैसे बताएँ
अपनी चाहत को ये, हमे कैसे समझाएँ,
कितना समझते हैं ये हमे कैसे दिखाएँ
कुछ दिखाना चाहते हों तो कैसे जताएँ।
ज़ुबाँ से शायद, ये सब कुछ न बता पाएँ
पर है मुमकिन के शब्दों में बयान कर जाएँ,
सब बच्चों को लिखने के लिए प्रेरित करें
और बच्चों से बच्चों का लिखा पढ़वाएँ।
खुद भी पढ़ें, के क्या लिखते हैं बच्चे
ताकि बच्चों के मन की बात को जान पाएँ,
और बच्चों के लिए, बच्चों की दुनिया को
हम बच्चों के अनुकूल और बेहतर बना पाएँ।
अपने विचार साझा करें
यह कविता बच्चों के अंदरूनी विचारों और सीमित मौखिक अभिव्यक्ति पर ज़ोर देती है। कवि सुझाव देता है कि बच्चे मन के सच्चे होते हैं, पर बोलकर अपनी बात नहीं बता पाते। इसलिए, उन्हें लिखने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। बड़ों को उनका लिखा पढ़ना चाहिए, ताकि बच्चों के मन की बात जान सकें और उनकी दुनिया को उनके अनुकूल बेहतर बना सकें।
