लक्ष्मण रेखा ANSHITA GUPTA
लक्ष्मण रेखा
ANSHITA GUPTAस्त्रियों के हिस्से ही क्यों आए
घर, परिवार, बच्चे, समाज और ज़िम्मेदारियाँ
क्यों मान लिया गया कि वो सब संभाल लेंगी,
किसी के चले जाने के बाद भी…
क्यों सुनाई गई ऐसी कहानियाँ
जहाँ उन्हें त्याग की मूर्ति बताया गया,
क्या यह एक षड्यंत्र था
स्त्रियों की स्वाभाविक चेतना को बदलने का?
प्रकृति कभी स्थिर नहीं होती,
वो चेतना है, जो निरंतर चलायमान है,
फिर स्त्रियों के लिए वर्जनाएँ क्यों?
क्या स्त्रियाँ यायावर नहीं हो सकतीं?
स्त्रियों को ये हमेशा याद दिलाया जाता है कि
भ्रमणशीलता उनके लिए अशोभनीय है,
लेकिन भटकने के लिए देह की आवश्यकता नहीं होती,
मन और आत्मा ही काफी हैं
इस कार्य को संपादित करने के लिए।
पुरुष के भटकने को ज्ञान की खोज से जोड़ा गया,
और स्त्रियों के यायावरपन ने
उनके व्यक्तित्व और चरित्र पर सवाल खड़े किए।
सत्य तो यह है कि
अंतस सबका भटक रहा है, किसी न किसी कारण से,
इस पृथ्वी पर…
फिर अकेले स्त्रियों के हिस्से ही क्यों आई
लक्ष्मण रेखा?
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यह कविता स्त्री-जीवन से जुड़े उन गहरे और अनकहे प्रश्नों को सामने लाती है, जिन्हें समाज ने लंबे समय से मौन स्वीकृति दे रखी है। कवयित्री यहाँ स्त्री की सामाजिक भूमिका, उससे जुड़ी अपेक्षाओं और उसके व्यक्तित्व पर थोपे गए आदर्शों को गंभीरता से चुनौती देती है। यह कविता स्त्री-चेतना, स्वतंत्रता और समानता की एक सशक्त वैचारिक अभिव्यक्ति है, जो पाठक को सोचने, असहज होने और स्थापित धारणाओं पर पुनर्विचार करने के लिए विवश करती है।
