पद्माकर | मातृभाषा - माँ भारती का श्रृंगार

पद्माकर

जीवन परिचय

ये  बाँदा के रहने वाले तैलंग ब्राह्मण थे। इनके पिता का नाम मोहन भट्ट था। पदमाकर पन्ना के महाराज हिंदूपति के गुरु थे। कई राज-दरबारों में इनका बड़ा मान था। यद्द्यपी इनको मिश्र-बन्धुओं के नवरत्नों में स्थान नहीं मिला है, तथापि लक्षणों की सरलता और स्पष्टता तथा उदाहरणों की उपयुक्तता और विशाल काव्यत्व के कारण इनका स्थान रीतिकालीन कवियों में बड़े महत्व का है। पद्माकर के सम्बन्ध में शुक्लजी का मत है :-- “लाक्षणिक शब्दों के प्रयोग द्वारा कहीं कहीं ये मन की अव्यक्त भावना को ऐसा मूर्तिमान कर देते हैं कि सुनने वालों का हृदय आप ही आप हामी भरता है । यह लाक्षणिकता भी इनकी बड़ी विशेषता है।” पद्माकर ने वीर –रस की भी कविता की है , किन्तु उसमें उतने सफल नहीं हुए जितने श्रृंगार रस में।

लेखन शैली

पद्माकर के सम्बन्ध में शुक्लजी का मत है :-- “लाक्षणिक शब्दों के प्रयोग द्वारा कहीं कहीं ये मन की अव्यक्त भावना को ऐसा मूर्तिमान कर देते हैं कि सुनने वालों का हृदय आप ही आप हामी भरता है। यह लाक्षणिकता भी इनकी बड़ी विशेषता है।”

प्रमुख कृतियाँ
क्रम संख्या कविता का नाम रस लिंक
1

अँचल के ऎँचे चल करती दॄगँचल को

शृंगार रस
2

ओप भरी कंचुकी उरोजन पर ताने कसी, 

शृंगार रस
3

कै रति रँग थकी थिर ह्वै

शृंगार रस
4

दाहन ते दूनी, तेज तिगुनी त्रिसूल हूं ते

वीर रस
5

चाह भरो चंचल हमारो चित्त

शृंगार रस
6

अधखुली कँचुकी उरोज अध आधे खुले

शृंगार रस
7

चहचही चुभकैँ चुभी हैँ चौँक

शृंगार रस
8

आरस सोँ रस सोँ

शृंगार रस
9

जाहिरै जागति सी जमुना

शांत रस

  परिचय

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