कुछ सलीका खुदा को भी सीखना चाहिए  सलिल सरोज

कुछ सलीका खुदा को भी सीखना चाहिए

सलिल सरोज

सच का सच सबको दिखता है,
झूठ का सच भी दिखना चाहिए।
 

आईना तो साफ ही रहता है,
चेहरा भी साफ रहना चाहिए।
 

इंसान घरों में कुरान रखता है,
दिलों में अज़ान भी रखना चाहिए।
 

अपनों पे ही तो ज़ुल्म कहते हैं,
दूसरों का भी ज़ुल्म कहना चाहिए।
 

जो रोज़ अपना ही ग़म चखते हैं,
कभी औरों का ग़म भी चखना चाहिए।
 

जो दूजे के घरों की खिड़कियाँ ताकते हैं,
उन्हें कभी अपना घर भी ताकना चाहिए।
 

मुफ़लिसी सरेआम बाज़ारों में बिकती हैं,
कभी तो रईसी का भी जिस्म बिकना चाहिए।
 

सब नसीहत इंसान ही सीख लेगा क्या,
कुछ सलीका खुदा को भी सीखना चाहिए।
 

आवाम हर बात पे ही झुकती है,
सियासतदानों को भी कभी झुकना चाहिए।
 

वो बच्ची है हर बात से डरती है,
दहशतगर्दों को भी कभी डरना चाहिए।
 

बच्चे कहें तो माँ रूक ही जाती है,
कभी माँ के लिए बच्चों को भी रुकना चाहिए।

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