चाक पे गढ़ी औरतें  सलिल सरोज

चाक पे गढ़ी औरतें

सलिल सरोज

क्या चाक पे
औरतें गढ़ी जा सकती हैं?
 

हास्यास्पद लगता है,
असंभव भी
और
थोड़ा बेतुका भी,
पर
ऐसा हो सकता है
क्योंकि
ऐसा ही होता आया है।
 

थोड़ा मिट्टी,
थोड़ा पानी,
चाक का जोरदार घुमाव
और
हाथों की कारीगरी,
बस
औरतें तैयार हो जाएँगी।
 

बचपन से
कोमल मिट्टी को
सौ घड़े पानी में
पैरों तले कुचल कर
मनचाहे आकार में
मोड़ते जाओ,
तो कभी
चाक की गति
और
उँगलियों की हरकतों से
पिटने से पीट-पीट कर
बेटी, बहन, बीवी, माँ
सब तैयार मिलती हैं।
 

फिर
धूप में सुखाकार,
आग में जलाकर,
बाज़ार में
बेचने लायक भी
बनाई जाती हैं
और
बिक भी जाती है,
जो शादी और उत्सवों में
रौनक बढ़ाती है,
मान-सम्मान दिलाती है
और
सब खत्म होने के बाद
कूड़े में फेंक दी जाती हैं।
 

ये चाक
हर घर में चलता है,
रोज़ चलता है,
सदियों से चलता है,
सबके हाथों से चलता है,
लेकिन
गढ़ने के क्रम में
हमारी
अमर्यादित लोलुपता,
दंभी पौरुष
और
शाश्वत अहंकार
मुँह बाए खड़ा हो जाता है,
और
कल्पनातीत
औरतें गढ़
दी जाती हैं।

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