प्रतीक्षा  DEVENDRA PRATAP VERMA

प्रतीक्षा

DEVENDRA PRATAP VERMA

कोई नहीं था
उसका,
जिसे वह
अपना कहती
सिवाय तुम्हारे,
शायद तुम नहीं जानते।
 

प्रभा की पहली किरण से
स्वप्नों की
अंतिम उड़ानों तक,
प्रतिदिन, प्रतिक्षण,
सिर्फ तुम थे
शायद तुम नहीं जानते।
 

सर्दी की धूप में
स्वेटर के धागों में
उलझते,
संवेदनाओं में
आकार लेते,
कभी
सरसों के खेत की
पगडण्डी पर,
उसकी गोद में
सिर टिकाए,
उसे निहारते
उसकी अंतरंग सी
बातों में हँसते
खिलखिलाते,
उसकी बाँहों में
लिपटे
दुःख की परछाइयों पर
रौब गांठते,
कभी सिरहाने
तकिये के नीचे से
निकल,
मधुर मिलन की
आस में लरज़ते
अधरों के नाजुक स्पर्श
तक सिर्फ तुम थे,
शायद तुम नहीं जानते।
 

उसने कहा नहीं
कभी किसी से
सिवाय तुमसे,
कि सिर्फ तुम थे
तुम जानते हो।
 

सिर्फ तुमने महसूस किया
उस पवित्र प्रेम की गहराई को,
और उड़ चले उसके संग
प्रेम के असीम अनंत
आकाश में,
जहाँ मिट जाता है
दो होने का भाव,
शायद
तुम जानते हो।
 

फिर भी तुम खामोश रहे
और उसने भी कुछ
नहीं कहा कभी
किसी से,
और चुपचाप
निभाई
तालीम और
संस्कार की
वह परंपरा
जिसके परिणीत
मैं आया
तुम जानते हो।
 

अब मैं हूँ,
जिसे वह
अपना कहती है
तुम जानते हो।
 

पर मैं नहीं जान पाया
क्यों हूँ
जबकि तुम हो
शायद तुम नहीं जानते।
नहीं ले सकता
मैं तुम्हारी जगह
और न भर सकता
हूँ उस खालीपन को
जो उत्पन्न हुआ है
मेरे होने से,
बस मुझे "प्रतीक्षा"
है प्रेम के उसी असीम अनंत
आकाश में उतर "तुम" होने की
शायद तुम नहीं जानते।
 

यही मेरी नियति है
शायद तुम नहीं जानते।

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