हम तुम  DEVENDRA PRATAP VERMA

हम तुम

DEVENDRA PRATAP VERMA

फिर रही है आसमा में
ख्वाबों की परियाँ जमीं की,
मैं अंधेरों से घिरा हूँ
तुम किरण हो रोशनी की।
 

तुमने दिखाए दृश्य वे
जिसने मुझे जीवन दिया,
आँखों में आँखें डालकर
बात की मेरी कमी की।
 

सोते हुए को क्या खबर कि
जागना क्या चीज है,
जागृति के अंकुरण पर
तुम परत सी हो नमी की।
 

पाके तुझको मैं जगत में
भूल बैठा हूँ स्वयं को,
मेरे अहम का नाश कर
तुम गुरु हो छवि सखी की।
 

हो क्षमा के योग्य न
तो भी क्षमा करना मुझे,
है मुझे अफसोस अपनी
की हुई हर गलती की।

अपने विचार साझा करें




0
ने पसंद किया
580
बार देखा गया

पसंद करें


  परिचय

"मातृभाषा", हिंदी भाषा एवं हिंदी साहित्य के प्रचार प्रसार का एक लघु प्रयास है। "फॉर टुमारो ग्रुप ऑफ़ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग" द्वारा पोषित "मातृभाषा" वेबसाइट एक अव्यवसायिक वेबसाइट है। "मातृभाषा" प्रतिभासम्पन्न बाल साहित्यकारों के लिए एक खुला मंच है जहां वो अपनी साहित्यिक प्रतिभा को सुलभता से मुखर कर सकते हैं।

  Contact Us
  Registered Office

47/202 Ballupur Chowk, GMS Road
Dehradun Uttarakhand, India - 248001.

Tel : + (91) - 7534072808
Mail : info@maatribhasha.com