एक सैनिक के मन की बात  बिजेंद्र दलपति

एक सैनिक के मन की बात

बिजेंद्र दलपति

मैं तेरे संग कुछ पल और बिताना चाहता था,
बाहों में लिपट के तेरे, तुझे प्यार जताना चाहता था।
 

चाहता था,
ये घड़ी के काँटे, कुछ देर और ठहर जाते,
ये जुदाई रूपी शैतान, ना मुझ पर यूँ क़हर ढाते।
काश वो काली रात, थोड़ी और लंबी हो जाती,
मैं तुझ में डूब जाता और तु मुझ में खो जाती।
 

पर क्या करूँ,
मैं हूँ एक फौजी, मेरी माँ मेरा देश है,
आज एक हरामखोर ने, ढाया उस पे क्लेश है।
मेरी माँ के पवित्र दामन पे, उसने लहू पोता है,
ओछी उसकी हरकतें और नीयत उसका खोटा है।
 

कैसे छोड़ दूँ,
उस कमीने को, जो हर बार गुस्ताख़ी करता है,
मेरी माँ के कोमल आँखों में, ख़ून के आँसू भरता है।
अपनी नीच हरक़तों से, वो कभी ना बाज आता,
सुधरता नहीं कभी, और हर बार हम से मात खाता।
 

मैं आऊँगा वापस,
अब बस, कुछ दिनों की ही तो बात है,
इस बार फिर उसकी, हार हमारे हाथ है।
तू बस, सज सँवर कर, मेरा इंतज़ार कर,
जयहिन्द का नारा लगाते, मैं आऊँगा वापस घर।
 

जय हिन्द

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