राजपथ की स्त्रियाँ  सलिल सरोज

राजपथ की स्त्रियाँ

सलिल सरोज

हर छब्बीस जनवरी को
पिछले तेहत्तर सालों से
कुछ स्त्रियाँ हमेशा
राजपथ पर दिख जाती हैं
अपनी स्वाधीनता की तलाश में।
 

लाव-लश्कर के साथ आए
गणमान्य अथिति बताते हैं, कि
फलाँ-फलाँ योजनाओं की घोषणाएँ कर दी गई हैं,
जिससे स्त्रियाँ अब पहले से भी मजबूत हुई हैं
और अब वो देश के पुरुषों के साथ मिल कर चलने लायक हो गई हैं,
और तो कई क्षेत्रों में वो पुरुषों से भी आगे निकल गई हैं।
 

उनकी बातों की सहमति करता हुआ
तभी महिलाओं का दस्ता हैरतअंगेज़ कारनामे करता निकलता है,
विभिन्न राज्यों की झलकियाँ निकलती हैं
जिसमें महिलाएँ रंग बिरंगी पोशाकें पहनी
गरबा, मणिपुरी, बीहू, भरतनाट्यम करती दिखती हैं,
और अधिकारियों की बातों का सत्यापन करती हैं।
 

देश और देशवाशियों की सुरक्षा में तैनात
तमाम हथियार प्रदर्शित किए जाते हैं,
विदेश से आए मुख्य अथिति
पंक्तिबद्ध बैठी लड़कियों को देख कर मुस्कुराते हैं,
और सब ठीक होने का अतिरेक भाव दर्शाते हैं।
 

और फिर राष्ट्रीय गान के साथ
हर विषमता का लोप होता चला जाता है,
गंगा-जमुनी तहज़ीब उफानें मारने लगता है,
कश्मीर से कन्याकुमारी तक
"हम एक हैं" का नारा गगूँजने लगता है,
और स्वतंत्रा सेनानियों का सब स्वप्न पूरा होता दिखता है।
 

और इस महती विधि-विधान के बाद
जब सारा स्वतंत्र भारत घर चला जाता है,
तब
खाली बोतलों को किसी फटे झोले में भरते हुए,
खाली कुर्सियों को समेटते हुए,
भरी धूप में
बच्चे को पीठ से बाँधे दिखाई देती हैं
राजपथ की स्त्रियाँ,
भय से दूर होने की तलाश में
अपनी समस्याओं के निदान में
और किसी मृगतृष्णा सी
स्वाधीनता की तलाश में।

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