परीक्षाएँ  सलिल सरोज

परीक्षाएँ

सलिल सरोज

1.
परीक्षाएँ इसलिए नहीं ली जाती, कि
किसी गरीब किसान का बेटा भी
उत्तीर्ण होकर
समाज में नामदार बन सके,
एक ही ऑफिस में
जात, पात, धर्म, बिरादरी, क्षेत्र की सीमाओं को लाँघ कर
सम्मान पूर्वक अपना और अपने परिवार का
भरण-पोषण कर सके
और बेरोज़गार, निकम्मे, निठल्लू जैसी गालियों से मुक्ति पा सके,
एक नए आसमान की रचना कर सके
जहाँ स्वच्छंद और उन्मुक्त विचार
हवाओं की तरह बह सके
और सींच सके सोच की
एक नई फसल
जो बहुत जरूरी है
इंसान के रूप में ज़िंदा रहने के लिए

बल्कि
परीक्षाएँ इसलिए ली जाती हैं, ताकि
आयोग और सरकारें
पैसे की उगाही कर सकें
जिससे, पिछली आयोग और सरकार द्वारा की गई
क्षतिपूर्ति की भरपाई की जा सके,
आयोग के नए सदस्यों की भर्ती की जा सके
और सरकार को अपने सरकार होने का पता चल सके,
कोर्ट कचहरी में सालों से लंबित मामलों की जिरह के लिए
उनके वकीलों की फीस का प्रबन्ध किया जा सके,
नए आयोग का गठन किया जा सके
जो यह बताए कि
परीक्षाओं की फीस किस तरह कम की जा सकती है
एक आयोग से दूसरे और फिर दूसरे से अनगिनत आयोग के
सलाहकारों को भत्ता दे सके, ताकि
परीक्षाएँ दुरुस्त हो सकें
और एक समावेशी और स्ववाबलम्बी समाज का गठन हो सके

और सबसे माकूल बात, कि
अगले पाँच बर्षों का जुगाड़ हो सके
मतलब अगले पाँच सालों की परीक्षाओं का
कैलेंडर बन सके
और बिना किसी देरी की
परीक्षाएँ हो सकें
 

2.
लगभग हर प्रतियोगिता परीक्षा में
कुछेक प्रश्न गलत रहते हैं, या
फिर उनके विकल्प
और अगर दोनों सही हैं तो
आयोग द्वारा मान्य उत्तरों से
उनका कोई सम्बन्ध नहीं होता
जिसकी समीक्षा हाई कोर्ट तक में होती है
सालों साल, और तब तक
परीक्षाएँ स्थगित होती रहती हैं
और परीक्षार्थी बर्बाद

लेकिन इन गलत प्रश्नों का भी
अपना महत्व होता है
ये गलत प्रश्न
मेधा सूची तय करने में
अव्वल भूमिका निभाते हैं
और इस बात का भरपूर ख्याल रखते हैं, कि
जिस जात वालों ने चुनाव जिताया है
उनके बच्चे उपेक्षित न रह जाए
और उन्हें भी
सामाजिक न्याय की पूरी सहानुभूति मिल पाए
और आखिर गणतन्त्र में
सबको साथ लेकर चलना पड़ता है
योग्य को भी, अयोग्य को भी
 

3.
परीक्षाओं का केंद्र
जब छोटे कस्बों और शहरों में पड़ जाता है
जहाँ पहुँचने के लिए दो दिन पहले
चार गाड़ियाँ बदल कर पहुँचना पड़ता है
तब पता चलता है कि
सफलता बिना मेहनत के नहीं मिलती है

और तब पता चलता है, कि
सारे होटल, धर्मशालाएँ भर चुकी हैं
और लड़के और लड़कियाँ
रेलवे प्लेटफॉर्म ,बस अड्डों पर
पिन्नियाँ बिछाकर
बैग को सिरहाना बनाकर
बासी और सूखा खाकर
और परीक्षाओं के इस सरकारी षड़यंत्र में उलझ कर
सुनहरे भविष्य के लिए
प्रश्न पत्रों को सुलझाते रहते हैं

और लड़कियाँ कहती हैं कि
कम से कम
हमें घर के पास का केंद्र देना चाहिए था
और तभी कोई दूसरी लड़की
सबको महिला सशक्तिकरण के निबन्ध का पाठ करती दिखती है
और सब में समाज को बदल देने का जोश भरती है

लड़के परीक्षार्थी
आयोग और सरकारों के लिए
थाली के बैंगन होते हैं
जिन्हें सरकारी नौकरी का झुनझुना बजा कर
कहीं भी घुमाया जा सकता है
और कई महीनों और सालों तक घुमाया जा सकता है

रात भर
परीक्षार्थी मच्छरों, खटमलों, और तिलचट्टों से
बातें करते अच्छे दिन के सपने देखते रहते हैं
और फिर सुबह में
परीक्षा केंद्रों में
उत्तर पुस्तिका में
हाँफी, उचटी हुई नींद, बोझिल शरीर की थकान
लिख कर आ जाते हैं
जिसका परिणाम सबको पता होता है
 

4.
परीक्षाओं की तैयारी
केवल परीक्षार्थी नहीं किया करते हैं;
उनके साथ पूरा परिवार भी तैयारी करता है

परीक्षार्थी
दूसरे बड़े शहरों जैसे दिल्ली जाकर तैयारी करता है
रात रात भर जाग कर पढ़ाई करता है
महीने के पहले पंद्रह दिन तो दूध दही सब खाता है
लेकिन आखिरी पंद्रह दिन मूँगफली, चूरा और सत्तू खाकर गुजारता है

वही उसके घर पर
बिहार जैसे राज्यों में
जहाँ सरकारी नौकरी भगवान् मिलने जैसा होता है
माँ-बाप अपनी जमीन जायदाद तक बेच देते हैं
भाई और बहन नए कपड़े नहीं खरीदते
महँगे होटलों में खाना नहीं खाते
सिनेमा ड्रामा नहीं देखते, ताकि
उन बचे हुए पैसों से
परीक्षार्थी सही से पढ़ सके
परीक्षा पास कर सके
और सबका जीवन सुधार सके

लेकिन परीक्षार्थी के वश में
केवल मेहनत करना होता है
जबकि उसे यह भनक भी नहीं होती है कि
परीक्षाएँ "अपरिहार्य" कारणों से
अगली सूचना तक रद्द कर दी गई हैं

परीक्षार्थी इतना कुछ पढ़ने के बाद भी
"अपरिहार्य" शब्द का मतलब समझ नहीं पाते
और दिन रात आयोग की साइट पर
उल्लू की तरह टकटकी लगी रखते हैं
और तरस जाते हैं अगली सूचना के लिए

और यह सिलसिला दिन से महीनों,
महीनों से सालों और सालों से उम्र निकल जाने में
परिणत हो जाता है
और घर वाले क़र्ज़ के बोझ तले दबते जाते हैं
एक परीक्षा की आश में
लेकिन यह सरकारी नौकरी वाला भगवान्
अपने वश में नहीं होता
इसे वही करना पड़ता है
जो आयोग और सरकारें बोलती हैं
वरना वो इस भगवान को सदा के लिए
भस्म भी कर सकते हैं
 

5.
परीक्षा पास करने के लिए
केवल मेधावी, लगनशील और मेहनती होना ही काफी नहीं होता
इन सब से भी ऊपर के कुछ गुणों की नितांत आवश्यकता होती है
जिसके बिना और सब गुण बेकार हैं

परीक्षा पास करने के लिए
परीक्षा का मार्किट में भाव भी पता होना चाहिए
किस केंद्र पर कितनी छूट है
प्रश्न किस पत्रिका या किताब से आने वाले हैं
और अच्छी साँठ गाँठ भी होनी चाहिए

वरना
आपको यह कभी पता नहीं चल पाएगा, कि
आप सालों साल मेहनत करके भी क्यों असफल हो जाते हैं
और आपका दोस्त सारे ऐश मौज के साथ टॉप कर जाता है
वो यथार्थ जो परीक्षा की विज्ञापन में दिखता है
और वो यथार्थ जो परीक्षा के परिणाम में दिखता है
दोनों में ज़मीन आसमान का फर्क होता है
और फिर आपन स्वयं तय करें, कि
आपको कहाँ रहना है
ज़मीन पर या आसमान में
 

6.
हमारे समाज में
परीक्षा देना हमेशा
कष्टकारी अनुभव होता है
फिर चाहे वो
सीता की अग्निपरीक्षा हो, या
एकलव्य का गुरुद्रोण के समक्ष
अपना अँगूठा समर्पण करने के लिए

यहाँ सौ रिक्तियों के लिए
सौ लाख आवेदन किए जाते हैं
और परीक्षार्थियों के बीच का संघर्ष
दुनिया के महानतम देशों से भी कड़ा होता है
यह मुकाबला क्षमता नहीं
भाग्य भी जाँचता है, क्योंकि
हर नौकरी पाने वाला यही कहता है, कि
"इट्स माय गुड लक "

और सौ सफल परीक्षार्थियों के अलावे
जो लाखों असफल परीक्षार्थी होते हैं
वो गहन चिंतन और मनन के बाद भी
अपनी असफलता का कारण जान नहीं पाते, और
फिर भाग्य को बलवान बनाने के लिए
विज्ञान की परीक्षा पास करने के लिए
हर शनिवार ढेरों लीटर सरसों तेल खर्च करने लगते हैं

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