विधवा  सलिल सरोज

विधवा

सलिल सरोज

माँ,
तुम श्रृंगार क्यों नहीं करती,
तुम्हारे अलावे
चुड़िहारिन, सब्जी-भाजी वाली, परचूनवाली
और यहाँ तक कि
हमारे घर में सफाई करने वाली भी
कितनी सुन्दर बन कर आती हैं,
एक तुम ही हो
जो पूरे घर में
किसी साजो-सामान के बगैर
पूरे घर में
सफ़ेद भूत की तरह घूमती रहती हो।
 

मेरे बच्चे,
मुझ पर बोझ है  
अच्छा नहीं लगने का
और सुन्दर तो बिलकुल भी नहीं दिखने का।
मुझे निभानी हैं समाज की
वो सारी कुरीतियाँ
जो मुझ जैसों के लिए छोड़ कर गई हैं
रामायण काल में सीता और अहिल्या,
महाभारत युग में माद्री और द्रौपदी,
खिलजी काल में जौहर करती जवान महिलाएँ,
ब्रिटिश काल से पूर्व सती होती ललनाएँ।
मुझे प्रतीक बनना है त्याग और सात्विकता का,
हालाँकि इतिहास में सब कुछ गलत ही नहीं,
हमारे वेद कहते हैं
"उदीर्ष्व नार्यभि जीवलोकं गतासुमेतमुप शेष एहि
हस्तग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सम्बभूथ"
मतलब पति की मृत्यु के बाद उसकी विधवा
उसकी याद में अपना सारा जीवन व्यतीत कर दे
ऐसा कोई धर्म नहीं कहता,
लेकिन वृन्दावन की विधवाओं के बारे में धर्म सन्न हो जाता है,
समाज बहरा हो जाता है
और संविधान गूँगा हो जाता है।
 

मेरे बच्चे,
मुझे निषेध है
रंगीन कपड़े पहनने से
बिंदी, चूड़ी, काजल, लाली, अलता से खुद को सजाने की,
मुझे सिर्फ सफ़ेद वस्त्र पहनना है
ताकि पुरुषों का शील भंग ना हो जाए,
मुझे सादा खाना ही खाना है
जैसा कि कोई रोगी खाता है
ताकि मैं रोगी ना बन जाऊँ,
मुझे सधवा महिलाओं से दूर रहना है
ताकि मेरी काली परछाई उनके पति को ना खा जाए,
अभी तो मेरे बाल भी हैं
क्या पता कल को
मुंडन भी करवाना पड़ जाए
और फिर तुम मुझे पहचान भी ना पाओ।
 

मेरे बच्चे,
मेरे सजने से
पूरी पृथ्वी का संतुलन बिगड़ सकता है,
जो शिक्षा, संस्कार, संस्कृति तुम प्राप्त कर रहे हो
सब पर बट्टा लग सकता है,
मेरे श्रृंगार करने से
आ सकती है सुनामी,
जो समाज की मर्यादा को बहाकर पाताल में ले जा सकती है,
मेरे सुन्दर लगने से
शेषनाग का फन डोल सकता है,
और उससे उत्पन्न भूकंप में हमारे पूर्वजों की रोपी हुई
मर्यादाओं की फसलें उखड़ सकती हैं,
वर्षों से सुसुप्त ज्वालामुखी से
अबाध लावा निकल सकता है,
जो जला सकता है भूत, भविष्य और वर्तमान।
 

मेरे बच्चे,
मैं पहले ही काफी बोझ से दबी पड़ी हूँ
और इन सारे पापों का भागीदार ना बनाओ,
तुम्हारी माँ विधवा है
किसी विधवा को सुंदरता का हक़दार ना बनाओ।

अपने विचार साझा करें




2
ने पसंद किया
117
बार देखा गया

पसंद करें


  परिचय

"मातृभाषा", हिंदी भाषा एवं हिंदी साहित्य के प्रचार प्रसार का एक लघु प्रयास है। "फॉर टुमारो ग्रुप ऑफ़ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग" द्वारा पोषित "मातृभाषा" वेबसाइट एक अव्यवसायिक वेबसाइट है। "मातृभाषा" प्रतिभासम्पन्न बाल साहित्यकारों के लिए एक खुला मंच है जहां वो अपनी साहित्यिक प्रतिभा को सुलभता से मुखर कर सकते हैं।

  Contact Us
  Registered Office

47/202 Ballupur Chowk, GMS Road
Dehradun Uttarakhand, India - 248001.

Tel : + (91) - 7534072808
Mail : info@maatribhasha.com