बरगद, बुलबुल और ज़िन्दगी  Shubham Amar Pandey

बरगद, बुलबुल और ज़िन्दगी

Shubham Amar Pandey

बरगद के नीचे बैठे हुए किसी शाम
एक बुलबुल को देखा था,
वो अपना आशियाँ बना रही थी
या अपने कल के दिनों का
रेखाचित्र खींच रही थी।
 

अगले दिन फिर उसी बुलबुल को देखा,
आज वो कहीं से आ रही थी,
कुछ क्षण ठहरी बरगद के पास
पुनः किसी सफ़र पर चली गई,
शायद अपने अंदर की बेचैनी का
हल ढूँढने गई थी।
 

आज फिर उसे देखा
बरगद के इर्द-गिर्द कुछ
ढूँढ रही थी,
मेरे पास आकर ठिठकी
बड़े गौर से आँखों में देखा,
मानो कहना चाहती हो कि
आशियानों की चाह में अगर
बरगद अकेले हो जाएँ
तो समझो
ज़िन्दगी फिसल रही है।

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