वारिस ... बेटी एक वरदान  VIKAS UPAMANYU

वारिस ... बेटी एक वरदान

प्रस्तुत कहानी बेटी के प्यार, त्याग और बलिदान की पराकाष्ठा को चित्रित करने का प्रयास किया है

रात अँधेरी और काली घनघोर घटा अपनी चरम सीमा पर थी, सीताराम अपनी अंतिम साँसे ले रहा था, देखते ही देखते उसका समय पूरा हो गया और वह इस भौतिक संसार से विदा ले चुका था। अब इस बात की खबर सभी रिश्तेदारों को दे दी गई। दोनों लड़के और उनका पूरा परिवार शोक व्यक्त करने में लग गया लेकिन एक शख्श उसके परिवार में ऐसा था जिसको देखकर लग रहा था कि मानो उसका सब कुछ छिन गया हो। अब सीताराम के अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू की जाने लगी, सीताराम को शव शय्या पर लिटा दिया गया, सभी लोग शोक मना रहे थे, तभी वहाँ अचानक एक मोटर आकार रुकी और उसमें से सूट पहने एक व्यक्ति उतरा और बोला मुझे सीताराम जी से मिलना है। ये बात सुनकर वहाँ खड़े लोगों ने कहा कि सीताराम जी अब इस दुनिया में नहीं रहे, ये जो शव आपके सामने है ये सीताराम जी का है। इतनी बात सुनकर वो व्यक्ति बोला, मेरे पैसे दिए बिना सीताराम जी नहीं मर सकते। सीताराम ने मुझ से २ लाख रुपये क़र्ज़ लिए थे, मुझे मेरे पैसे चाहिए। मैं तब तक इस अर्थी को नहीं उठने दूँगा जब तक कि मुझे मेरे पैसे नहीं मिल जाते। अभी ये सब बातें हो ही रही थीं कि तभी वहाँ एक और व्यक्ति अपना कर्जा लेने पहुँच जाता है। अब वो दोनों व्यक्ति अड़ जाते हैं कि जब तक हमें हमारे पैसे नहीं मिलेंगे हम सीताराम का अंतिम संस्कार नहीं करने देंगे। वहाँ इकट्ठे खड़े सभी मोहल्ले एवं रिश्तेदार तमाशा देख रहे थे। तब सीताराम के लड़कों ने बोला कि पिता जी ने हमें कभी किसी क़र्ज़ के बारे में नहीं बताया, इसलिए हम क़र्ज़ क्यों दें? बेटों की यह बात सुनकर सभी रिश्तेदारों ने भी अपना पल्ला झाड़ लिया कि जब बेटे ही नहीं दे रहे तो हम क्या कह सकते हैं।

देखते-देखते बात बहुत बढ़ गई, सीताराम की बेटी से ये सब नहीं देखा गया और वह तुरंत सीताराम के शव के पास आई और अपने सारे जेवर-गहने उतारकर उन दोनों व्यक्तियों को देते हुए बोली,"आप लोगों से जो भी क़र्ज़ मेरे पिता जी ने लिया था उसको मैं धीरे-धीरे उतार दूँगी, अभी आप मेरे सभी गहने ले लीजिए और मेरे पिता जी का अंतिम संस्कार करने दीजिए।" बेटी की ये बात सुनकर उन दोनों व्यक्तियों की आँखों में आँसू आ गए और उस बेटी को उठाकर बोले, "बेटी हमें सीताराम से पैसे लेने नहीं बल्कि उसको देने थे लेकिन हम लोगों को उसके असली वारिस का नहीं पता था, इसलिए हमने ऐसा नाटक किया, हो सके तो बेटी हमें माफ कर देना।" ऐसा बोलते हुए दोनों व्यक्तियों ने सारी रकम उस बेटी को देते हुए कहा, "बेटी तुम ही सीताराम की असली वारिस हो और वहाँ से चले गए।"

दोस्तों, इस कहानी के माध्यम से मैं सिर्फ एक ही बात कहना चाहूँगा, कुछ लोग बेटों की चाहत में न जाने कितनी मासूम बेटियों को इस संसार में आने से पहले ही मिटा देते हैं और हम लोगों का भ्रम होता है कि बेटा ही हमारा वारिस होता है, जबकि इतिहास उठा कर देख लो एक बेटी ने हमेशा अपने माँ-बाप का साथ दिया है तो क्यों न बेटी भी हमारी असल वारिस हो।

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