सुधिया की दीपवाली  Upendra Prasad

सुधिया की दीपवाली

गरीबी काफ़ी कष्टकर होती है। यह तब और दयनीय हो जाती है जब परिवार के मुखिया गैर-जिम्मेदार हो जाते हैं और समाज इसकी उपेक्षा करने लगता है। यह कहानी इसका एक ज्वलंत उदाहरण है।

दीपावली का दिन ! कोई कपड़े खरीद रहा है तो कोई पटाखे। कोई मिठाइयाँ खरीद रहा है तो कोई अपने घरों को सजाने में लगा है। सुधिया तो इन सभी अरमानों को अपने मन में कैद कर अपने बापू संग मिट्टी के दीपों को टोकरी में सहेजने में लगी है ताकि आज उसे बाज़ार में बेचकर ढेर सारे पटाखे और मिठाइयाँ खरीद सके। किन्तु एक साल का भाई भोलू उसे काफी तंग कर रहा है। कभी दीप को तोड़ देता तो कभी कुल्हिया को। भोलू के जन्म के साथ ही बीते साल माँ स्वर्ग सिधार गई। बापू का कार्य बस हँड़िया (मादक पेय) के जुगाड़ तक सीमित है। फलत: परिवार संचालन का सारा बोझ बारह साल की अभागिन सुधिया पर है। सुधिया की तबीयत ख़राब होने पर सभी को पेट बाँधकर सोना पड़ता।

अस्तु , सुधिया दीप एवं कुल्हिया भरी टोकरी को एक-एक कर बाज़ार में पहुँचाने लगी है। बापू पगड़ी बाँधकर बाज़ार में एक ऊँचे चबूतरे पर बैठ चुके हैं जबकि भोलू अपने अज़ीज बहन के पीठ पर हवाई-यात्रा करने में मस्त है। सुधिया ने अपने सारे दीपों एवं कुल्हियों को टोकरी से निकालकर बापू के लिए एक शानदार दुकान सजा दी है।अब इंतजार है ग्राहकों का, जो जल्द-से -जल्द इसे खरीद सके। किन्तु रंग-बिरंगे दीपों के आगे बेचारी सुधिया के दीप फीके पड़ रहे हैं। ग्राहकों की भीड़ उन रंग-बिरंगे दुकानों तक ही सिमट कर रह गई है। भूले-भटके ग्राहक भी सुधिया की दुकान पर ठहरने की जोहमत नहीं उठाते। इधर उसका भाई भोलू ने भी भूख से चिल्लाना शुरू कर दिया है। भोलू के चिल्ल-पों से कहीं ग्राहक रुख़सत न हो जाए, इससे पहले ही सुधिया भोलू को गोद में लेकर पटाखों की दुकान पहुँच गई। रॉकेट, छुरछुरी, बम पटाखे देखकर सुधिया के अरमानों को पंख लग गए। दौड़ी-दौड़ी वापस अपनी दुकान पहुँची, कहीं कोई दीप, कुल्हिया बिक गए हों। पर बोहनी होने का तो नाम ही नहीं ले रहा है। इधर शाम होते ही बापू का नस टान रहा है। गुस्से से लाल होकर सुधिया को एक थप्पड़ जड़ भी दी। बेचारी सुधिया अपने भोलू को लेकर मिठाई की दुकान पहुँच गई। मीठी-मीठी, भीनी-भीनी सुगंध ने सुधिया एवं भोलू को उत्तेजित कर दिया है। ललचाई आँखों से सुधिया मिठाई की दुकान के पास खड़ी रही। अचानक उसका भाई भोलू ने मिठाई की ओर अपना हाथ बढ़ा दिया। सभी ने एक स्वर से सुधिया को फटकारते हुए वहाँ से खदेड़ दिया। बेचारी सुधिया बेबस है। एक तरफ बापू का गुस्सा तो दूसरी तरफ भोलू की भूख। इसके बीच वह गेहूँ की तरह पिसकर रह गई है।

गोधूलि छा गई। मुँडेरों पर जलते दीप सजने लगे हैं। दीपों को देखकर सुधिया की उम्मीद पनपने लगी। शायद किसी के पास इतने सारे दीप न हो जो सारे मुँडेरों पर सजा सके। वह तो जरूर आएगा और उसका दीप खरीदकर ले जाएगा। और हाँ, कई ऐसे बच्चे भी होंगे जो दिन में कुल्हिया (मनी बैंक) खरीदना भूल गए होंगे, वे तो जरूर उसकी कुल्हिया को खरीदने आएँगे। इस उम्मीद के साथ सुधिया, भाई भोलू को टाँगे अपनी दुकान लौटी। पर बापू गायब है। साथ ही दो कुल्हिया भी कहीं दीख नहीं रहा है। अल्प बुद्धि होते हुए भी सुधिया को यह समझते देर न लगी कि उसके दो कुल्हियों के बिकते ही बापू के हँड़िया का बंदोबस्त हो गया होगा और अब वे हँड़िया के साथ ही कहीं बेसुध पड़े होंगे।

सुधिया की बची-खुची उम्मीदें अब ख़ाक हो चुकी हैं। मुँडेरों के दीप भी बुझने के कगार पर हैं। अँधेरा पसर रहा है। चारों तरफ सन्नाटा छा रहा है। अब घर वापसी के सिवाय कोई अन्य चारा नहीं है। पीठ पर भोलू की गठरी बाँधकर, माथे पर दीपों की टोकरी लिए सुधिया भारी मन से घर की ओर प्रस्थान की। किसी बूढ़े बाप के कँधे पर एक जवान बेटे की अर्थी का जो दर्द होता है उसे सुधिया ही सहन कर सकती है।

किसी तरह बिखरे अरमानों के साथ सुधिया अपने घर पहुँची। दरवाजे की कुण्डी खोलकर एक खटिया पर भोलू को सुलायी। दीपावली के नाम पर टोकरी से एक दीप निकालकर जलाई और उसे दरवाजे पर रख दी। रातभर भोलू के निकट बैठकर उस दीप को अपने बिखरे अरमानों और बुझी उम्मीदों से निहारती रही कि कदाचित कोई समाज उस सुधिया की सुध लेने पहुँचे।

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