मेरी अविस्मरणीय सेवा-यात्रा  Upendra Prasad

मेरी अविस्मरणीय सेवा-यात्रा

मेरी सेवा-यात्रा कई दृष्टांतों से परिपूर्ण है जिसमें झारखण्ड राज्य की यात्रा कई मायनों में मेरे परिवार के लिए अविस्मरणीय हो गई। इस दौरान मैंने दोस्ती की कीमत, स्त्री की क्षमता और परिवार के महत्त्व को भलीभांति समझा। सबसे बढ़कर उस विरह-वेला में पति-पत्नी एवं माँ-बच्चों के प्यार का उन्नयन सर्वोत्तम देन रही। इन्हीं दृष्टांतों को मैंने प्रस्तुत रचना में समेटने की कोशिश की है।

आँखों के सामने हजारों नजारे हैं। कुछ नज़रें यूँ ही सरक जाती हैं तो कुछ यदा-कदा स्मरण-पटल पर अपनी उपस्थिति दर्ज करती रहती हैं। परन्तु कोई नज़र जब दिल को उद्वेलित कर देती है तो वह सदा के लिए मानसपटल पर विराजमान हो जाती है। ऐसे ही एक नज़र से मेरा सामना झारखण्ड राज्य में हुआ, जो आजतक दृश्यमान है।

यह बात उन दिनों की है जब मैं सरकारी सेवा में प्रवेश के साथ ही जबरन झारखंड राज्य के लिए डिस्पैच हुआ। राजधानी रांची पहुँचते ही अंडमान निकोबार की कहानी कानों में गूंजने लगी। न ठौर, न ठिकाना। सब्र की बात यह थी कि ऐसी हालात में हम अकेले नहीं थे। किस्मत के मारे मेरे कई दोस्त भी थे। मिल-जुल कर दु:ख-दर्द साझा कर लेते थे। मज़े की बात यह थी कि जो पहले मुलाकात से कतराते थे, अब साथ रहने को आतुर थे। बेवफा कहे जाने वाले दोस्त अब वफादार बन गए थे। सचमुच दोस्ती की कीमत दु;ख में ही समझ आती है।

खैर, समय बीतने के साथ ही अपने राज्य बिहार वापसी की आस धूमिल पड़ने लगी। अब उखड़े हुए पाँव को स्थिर ठिकाने की तलाश होने लगी।बिरसा भगवान की अनुकंपा से उनके सन्निकट मोहल्ले में ही एक आवास मिल गया। आवास मिलते ही अपना परिवार भी आ धमका। पहले बच्चे का एडमिशन, फिर घर का डेकोरेशन। घर-गृहस्थी अब पटरी पर लौटने लगी थी, तभी बिहार लोक सेवा आयोग का बंपर धमाका हुआ। कई राजपत्रित पदों पर चयन हेतु विज्ञापन प्रकाशित किए गए। मैं बिहार प्रशासनिक सेवा का आश्वस्त अभ्यर्थी बना जबकि पत्नी बाल विकास परियोजना पदाधिकारी के लिए ही आवेदन कर संतुष्ट थी। चयन से बढ़कर इस माध्यम से राज्य वापसी की आस प्रबल थी। अब हम दोनों अपनी संपूर्ण ऊर्जा से महासमर की तैयारी में जुट गए।

अपनी पत्नी के अथक परिश्रम को देखकर मुझे पहली बार अहसास हुआ कि नारी-शक्ति के उन्नयन में झारखंड की जलवायु कितनी मददगार है। सचमुच वहाँ पत्नी नहीं कमाए तो पति भूखे ही सोए। मुझे तो कम्बख्त काम ने इतना दबा दिया था कि घर पहुँचते-पहुँचते मेरी सारी ऊर्जा समाप्तप्राय हो जाती। बची-खुची उर्जा बच्चों की पढ़ाई में सफाचट हो जाती। अंत में निष्क्रिय होकर बिस्तर का सहारा लेता। किंतु पत्नी को पढ़ते देख मुझमें भी पढ़ने का जोश जागृत हो जाता। नींद से उबरने के लिए हम डिबेट करते, पर पढ़ाई-लिखाई के दायरे तक ही।

हमारे पढ़ने-लिखने की आँखमिचौली निरंतर चलती रही। किंतु परीक्षा की तिथि घोषित होते ही हम अपनी तैयारी के प्रति गंभीर हो गए। हम दोनों ने अपनी-अपनी पूर्ण क्षमता के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं का डटकर सामना किया। परीक्षाफल प्रकाशन के साथ ही पत्नी ने बाजी मार ली जबकि मेरी किस्मत मुख्य परीक्षा की सरहद भी न पार कर सकी। मैं इत्मीनान से बैठकर अपने भाग्य को भरपेट कोसता, इससे पहले ही पत्नी राजपत्रित पद पर नियुक्त होकर अपने राज्य वापस हो चुकी थी। पत्नी की गैर-मौजूदगी में मैं बच्चों के चलते एक मशीन बन कर रह गया। राज्य वापसी की आस तो खाक हो ही चुकी थी। जीवन चलने के बजाय अब सरकने लगी। सारी उम्मीदें टूट चुकी थीं।

कहा जाता है कि अंधेरा जब गहरा जाता है तो सवेरा होने की आहट मिलने लगती है। पत्नी के जाने के बाद उसका महत्व समझ में आने लगा। सुसुप्त प्रेम प्रज्वलित हो उठा। अब माह के लगते ही पत्नी के आने का इंतजार शुरू हो जाता। हम घर को साफ-सुथरा और सुसज्जित करने में जुट जाते तो बच्चे अपना होमवर्क पूरा करने में लग जाते। पत्नी के पदार्पण के साथ ही घर की रूठी रौनकता अँगड़ाई लेने लगती। बच्चों को ममता का आंचल और मुझे पत्नी का स्नेहिल प्यार मयस्सर होता। घर स्वर्ग-सा सुंदर दीखने लगता।

परंतु छुट्टी बीतते ही हमारी खुशियों को ग्रहण लगने लगता। आखिर वह दिन आ ही जाता जब पत्नी को प्रस्थान करना पड़ता। हम सभी बस स्टैंड जाते। नि:शब्द होकर केवल एक-दूसरे को निहारते रहते। माँ-बच्चों की दयनीय दृष्टि कलेजों को छू जाती। मैं देखकर हतप्रभ रह जाता। बस धैर्य रखने के सिवाय कोई अन्य विकल्प ना था। भारी मन से हम सब घर लौट आते।

इस तरह से पत्नी के आने-जाने और मिलने-बिछुरने का सिलसिला कई सालों तक चलता रहा। विरह और वेदना हमारे पारिवारिक जीवन का एक हिस्सा बन चुकी थी। किंतु नियति को यह सब ज्यादा दिनों तक पसंद नहीं था। सरकार की सुमति से हमारे राज्य वापसी का मार्ग प्रशस्त हुआ। महाबली हनुमान जी को सवा किलो का लड्डू अर्पित किए और अपने बच्चों सहित अपने राज्य वापस आ गया। आज मैं बड़े गर्व के साथ कह सकता हूँ कि झारखंड प्रवास के दौरान जो खोया, वह मुझे याद नहीं, पर जो पाया, वह मेरे परिवार के लिए धरोहर बन गया।

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