हवाई अड्डा  Vimal Kant Pandey

हवाई अड्डा

वर्त्तमान समय में हर कोई अनदेखे भविष्य को सँवारने में लगा है, कोई वर्त्तमान का आनंद नहीं लेता है। ये कहानी भी एक ऐसे व्यक्ति की है जो एक अनदेखे भविष्य को सँवारने के लिए अपना सब कुछ छोड़ कर नए देश में जा रहा है। ये कहानी उसके मनोभावों को व्यक्त करती है।

हवाई अड्डे की वो चकाचौंध रौशनी, वो शोरगुल, ना ही तो दिखाई दे रहे थे ना ही सुनाई दे रहे थे, क्योंकि अन्तः में घनघोर अँधेरा और ख़ामोशी थी। यूँ तो पूरे परिवार के साथ घिरा हुआ था पर लग रहा था मानो किसी वीराने में खड़ा हूँ। आज का समय कुछ ऐसा हो गया है कि मनुष्य अपने वर्तमान को हँसी खुशी जीने के बजाए भविष्य को बनाने की दौड़ में लगा हुआ है। मैं कभी इस दौड़ का हिस्सा ना था, ना ही सोचा था कभी बनूँगा पर जाने कब, कैसे उसी दौड़ का हिस्सा बन गया पता भी नहीं चला। इसी दौड़ को जीतने की चाहत में निकल पड़ा था, मैं भी सब छोड़ कर अपना देश, अपना घर-परिवार सब कुछ उस भविष्य के लिए जिसका कुछ पता नहीं था। क्या होगा? कैसा होगा? हर कोई अपने ही ढंग से समझा रहा था बस चार साल की ही तो बात है उसके बाद एक अच्छा भविष्य होगा। अच्छे से मन लगा कर काम करना यहाँ की परवाह मत कर करना, हम लोग हैं सब सँभाल लेंगे। पर बार-बार एक सवाल मन में कौंध रहा था कौन सा भविष्य? कौन जानता है क्या होगा चार साल बाद, क्या ज़रूरी है सब अच्छा ही होगा? कोई मुझसे नहीं पूछ रहा था कि तुमको क्या लग रहा है, क्या तुम सब छोड़ कर रह पाओगे? शायद एक बार भी कोई बोल देता या पूछ लेता था तो मैं अपने बढ़े क़दमों को वापस खींच लेता। कभी-कभी लगता है कि अगर मध्यम वर्गीय लोगों में ये विश्वास नामक वस्तु ना होती तो हमारा क्या होता? कितनी सहजता से ये एक चीज़ हम लोगों को किसी अनजानी राह पे निकल पड़ने को प्रेरित कर देती है।

सामने वो भी खड़ी थी आँखों में आँसुओं के सैलाब को थामे, होठों में झूठी मुस्कान लिए। करती भी तो क्या, शायद वो जानती थी कि यदि आज ये सैलाब टूटा तो मैं कभी उस द्वार के पार नहीं जा पाउँगा। यूँ तो हमने कई बार इस पर चर्चा की थी और हर बार उसने मेरी ना को हाँ में बदल दिया था। इस वक़्त ये नहीं समझ आ रहा था कि ये वही लड़की है जिसका चार साल पहले हाथ थमा था तो पूरी तरह मेरे ऊपर ही निर्भर थी, कुछ भी करती थी मेरे साए में ही करती थी, घर से बाहर निकलने के लिए भी जबरदस्ती करनी पड़ती थी, पर आज इतनी दृढ़ कैसे लग रही है? पर शायद इसलिए तो कहते हैं कि स्त्री को समझना अत्यंत कठिन है, कभी छोटी से छोटी बात पर अत्यंत भावुक हो जाती है तो कभी बड़ी से बड़ी विकट परिस्थिति में पर्वत की भाँति दृढ़ खड़ी होती है। उसका ये रूप मेरे लिए एकदम नया था। खैर इंसान अंदर की भावनाओं को छुपाने का दिखावा क्यों ना करे पर आँखें अंदर के सच को बयाँ कर ही देती हैं और उसकी आँखें तो कुछ ज्यादा ही बोलती हैं। उसके अंदर डर और परेशानी सब मुझे साफ दिख रहे थे पर क्या करता मैं भी बेबस था और इतना जितना पहले कभी नहीं हुआ। इन सब में सबसे ज्यादा कोई चीज़ जो मुझे सबसे ज्यादा विह्वल कर रहे थी तो वो थी मेरा ढेड़ साल का बेटा, उससे दूर जाने की कल्पना मात्र से ही मेरा कलेजा फटने को होता था, आज उसे भी छोड़ कर जा रहा हूँ और उस मासूम को तो पता भी नहीं कि क्या होने वाला है| वो हवाईअड्डे की चमक दमक और शोरगुल देख कर खुश था कभी इधर भाग रहा था कभी उधर भाग रहा था। उसको देखकर थोड़ी देर के लिए मेरे अंदर का अंतर्द्वंद थम तो रहा था पर फिर अगले ही पल दुगनी तेज़ी से उठ रहा था।

हर सुबह ऑफिस जाते वक़्त कुछ दूर मेरे साथ जाना, शाम को छत पे फुटबाल लेकर मेरा इंतज़ार करना, अब वो ये सब कैसे करेगा उसके लिए तो सब बदल जाने वाला, वो इस बदलाव का सामना कैसे करेगा ? जब वो ढूंढेगा मुझे तो ये कैसे समझाएगी और क्या समझाएगी इसको? पिता की अँगुली पकड़कर जब चलने और कंधे पे बैठ के घूमने का वक़्त आया तो मैं उसके पास नहीं रहूँगा सोच कर ही कलेजा फट रहा था। कभी-कभी ऐसा लग रहा था मनो साँसें ही रुक गई हों। यूँ तो बहुत शोर था बाहर पर उतना ही सन्नाटा अंदर था, फिर भी साँसों का शोर सुनाई नहीं दे रहा था। ऐसा लगता था मानो अभी गिर जाऊँगा। किसी तरह अपने को संभाले था और उसकी चंचलता का आनंद लेने की कोशिश कर रहा था। शायद वो भी मेरे मनोभावों को पढ़ ले रहा था इसीलिए वो सभी हरकतें कर रहा था जिस पर हम कभी खूब हँसते थे। कौन जाने, क्या पता उसे भी एहसास हो गया था कि मैं उससे दूर जा रहा हूँ और शायद इसलिए तो बच्चों को भगवान का रूप कहते हैं जो बिना बोले ही सब समझ जाते हैं।

मन इन्हीं सब उहा-पोह में उलझा हुआ था तभी छोटे भाई ने कहा अब तुम्हें निकलना चाहिए, इतना सुनते धड़कनें एक दम जी उठीं, हृदय इतनी तेज़ी से धड़कने लगा मानो अभी सीने को चीरता हुआ बाहर आ जाएगा। उससे मुझे अभी बहुत कुछ कहना था बहुत कुछ समझाना था, वो सारी बातें इतनी तेज़ी से मन में आ रही थीं कि ज़बान उसे व्यक्त करने में असमर्थ थी। उसके अंदर का सैलाब भी अब रुकने वाला नहीं था। सब्र का बाँध अब भावों के समंदर को ज्यादा देर रोक नहीं सकता था। उसकी आसमानी आँखों ने अब छलकना शुरू कर दिया था। उन मोतियों को अब वो और नहीं संभाल सकती थी। मैं समझ चुका था कि अब और थोड़ी देर रुका तो मैं खुद को रोक नहीं पाउँगा और ना ही कभी जा पाउँगा। सबको गले लगाया और एक अंतिम बार अपने जिगर के टुकड़े को गोद में लेकर उसे अपना स्नेह दिया। समझ नहीं आ रहा था कि उससे क्या बोलूँ ? क्या कहूँ? बस उसे बार-बार स्पर्श कर रहा क्योंकि पता नहीं कब उसे गोद में लेने का सौभाग्य मिले, बस यही स्पर्श ही है जो वहाँ मुझे जीने की और अपनी मंज़िल को पाने की प्रेरणा देगा।

खैर अब वो समय आ चुका था, किसी तरह मुड़ा और आगे निकल पड़ा। एक- एक कदम उठाने में ऐसा लगता था मानो पैरों में किसी ने जंज़ीरों से पहाड़ बाँध दिए हों। पीछे मुड़ने को बार-बार जी करता था पर हिम्मत नहीं थी क्योंकि एक बार मुड़ता तो फिर आगे जाना मुश्किल था। मन में यही ख्याल आ रहा था कि क्या पता बेटा अभी आवाज़ लगाए तो तुरंत लौट जाऊँ पर अफ़सोस कि अभी वो बोलता नहीं। किसी तरह अंदर पहुँचा, सारी औपचारिकता पूरी की और एक शांत कोना देख कर बैठ गया। पत्नी को फ़ोन किया हालचाल जानने के लिए तो उसने बताया सब ठीक है वो लोग भी निकल चुके थे, बच्चा भी खेल रहा था। जाने क्यों दिल को सुकून सा नहीं मिला। क्या पता उसने मुझे सच बोला या नहीं, कि मुझे तस्सली देने को झूठ बोला? खैर थोड़ी देर में हवाईजहाज में था अपनी नई मंज़िल की ओर जाने को तैयार।

कोई चार-पाँच घंटे बाद पहले गंतव्य पर पहुँचा वहाँ से अगले चार घंटे बाद दूसरा हवाई जहाज लेना था, कोई बारह घंटे बाद अपनी मंज़िल पे पहुँच चुका था। सब कुछ एक दम नया था मेरे लिए, चारों तरफ बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ, साफ सुथरी सड़कें, सरपट दौड़ती गाड़ियाँ, फिर भी हर तरफ शांति। यहाँ अपने देश जैसा कुछ भी नहीं था। जैसे अपने यहाँ बेवजह हॉर्न बजाते सड़कों पे गाड़ियाँ, सड़को से उड़ती हुई धूल आदि चीज़ें बिलकुल नहीं थी। मेट्रो में यूँ तो भीड़ बहुत थी पर शोर बिलकुल नहीं था, सभी अपने मोबाइल में ऐसे लगे थे मानो किसी ने रोबोट बैठा रखा हो। ये सब देखते समझते थोड़ी देर मैं अपने अंदर की हलचल, सबको पीछे छोड़ आने का दुख भूल चुका था। कोई एक घंटे बाद अपने निर्धारित स्थान पे पहुँचा।

एक छोटा सा कमरा जिसमें एक आलमारी, चारपाई और कुर्सी पड़ी थी। हर तरफ एक अजीब सी खा जाने वाली ख़ामोशी थी। कमरे में प्रवेश करते ही फिर हवाई अड्डे वाली बेचैनी मुझ पर हावी होने लगी और ऐसा लगा मानो अब साँसें उखड़ रही हों। कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या करूँ, भाग कर खिड़की की तरफ गया, जल्दी से खिड़की खोली तो सामने का दृश्य देख कर थोड़ा मन को शांति मिली क्योंकि कुछ अपना सा लगा। जिन पहाड़ियों को छोड़ कर आया था ऐसी ही पहाड़ी सामने थी। हल्की-हल्की सर्द हवा जब जिस्म को छूकर गई तो थोड़ी साँसें भी स्थिर हुईं और दिमाग खुद को समझाने की कोशिश करने लगा कि अब यही ज़िन्दगी है यही लोग और यही चारदीवारी है जो कुछ साल साथ रहेगी। ना चाहते हुए भी अब मैं भी उस दौड़ का हिस्सा बन चुका था जिसमें वर्तमान का कोई मोल नहीं है बस उस अनदेखे अनजाने भविष्य को सँवारने की होड़ लगी है। सब कुछ होते हुए, एक भरा पूरा परिवार होते हुए भी आज अकेला इस नए देश में खड़ा हूँ और किस लिए आया हूँ यहाँ, क्या मज़बूरी ले आई है यहाँ, सब कुछ तो था वहाँ? पैसा, जी हाँ पैसा। इस आधुनिक युग में यही तो एक सबसे बड़ा मापदंड है इंसान की खुशी नापने का। जाने क्यों लोगों को लगता है कि पैसा है तो ही हर खुशी मिल सकती है? जितना भी हो लोगों को कम ही लगता है और अगर आप कम में खुश तो लोग आपको ये बताने की कोशिश ज़रूर करेंगे कि इतने से कुछ नहीं होगा। भविष्य का सोचो भविष्य का, भविष्य………..?

खैर खुद से इतनी बहस करके क्या फायदा अब तो इसी दौड़ में मैं भी आ चूका हूँ। मन में उठते विचारों को विराम लगाया, एक गहरी साँस ली और उन हरी भरी पहाड़ियों को देखते-देखते पुरानी यादों में खो गया।

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