मीरा  Sneha Srivastava

मीरा

ईश्वर द्वारा प्रदत्त जीवन अनमोल है। हमारा यह जीवन कई उतार-चढ़ाव से होकर गुज़रता है। कई लोग अपने जीवन के चढ़ाव को संभाल नहीं पाते और कई लोग अपने जीवन के उतार में संभल नहीं पाते। जीवन जीने की कला किताबों से नहीं, अनुभवों से आती है। मीरा ने अपने कठोर जीवन को सरल बना इस बात को प्रमाणित कर दिया है।

शीत ऋतु की संध्या का स्मरण होते ही मन में सिहरन से उठ आती है। भुवनेश्वर में दिसंबर के प्रारंभिक दिनों में सर्दी अपने बाल्यकाल में होती है। भुवनेश्वर में हमें आए हुए 3 ही वर्ष हुए हैं। कुछ परिचितों को छोड़कर ज्यादा लोगों से हमारी जान-पहचान नहीं है। सरकारी नौकरी में इनके रहने से कुछ वर्षों के अंतराल पर हमारा स्थानांतरण होना तय है। इनकी पहली पोस्टिंग भुवनेश्वर में ही हुई है। भुवनेश्वर ओड़िशा की राजधानी है। ओड़िया लोग बहुत ही मेहनती व शांत प्रकृति के होते हैं। राजधानी होने के बावजूद भी यहाँ शोरगुल, लड़ाई-झगड़ा न के बराबर है। यहाँ लोगों की ज़िन्दगी भागती- दौड़ती नहीं रहती है। लोगों में आपसी प्रेम, अपनत्व व सादगी जैसी अतुलनीय भावनाएँ हैं जो आज के समय में विलुप्त होती जा रही हैं। नया शहर, नए लोग, नया वातावरण सब कुछ ही हमें बहुत भाया है। देखते ही देखते 3 वर्ष निकल गए और हमारी ज़िन्दगी में एक नन्ही परी आई। उसके आते ही हमारा आँगन खुशियों से खिल उठा। परी की किलकारियों ने जीवन को खुशनुमा बना दिया। अब तो 24 घंटे भी छोटे लगने लगे हैं। लग रहा है कि ज़िन्दगी पंख लगाकर उड़ रही है।

इस व्यस्तता में मुझे कमर दर्द की शिकायत हो रही थी। लगता था जैसे किसी ने 10 किलो का भारी पत्थर मेरी कमर पर बाँध दिया हो । इन्होंने मालिश करवाने की सलाह दी परंतु हम यहाँ किसी को जानते कहाँ थे, किससे कहें, कहाँ पूछें? इन सब उधेड़बुन के दौरान दर्द हद से ऊपर उठने लगा। इन्होंने अपनी खोज की रफ्तार बढ़ा दी। कईयों से पूछने पर एक ही नाम का पता चलता ‘मीरा’। कॉलोनी से लेकर दफ्तर तक सबने उसी का नाम सुझाया। "वफादार है और काम भी ढंग से करती है।"- कॉलोनी के बाहर सब्जी बेचनेवाले ने कहा। प्रश्न यह था कि वह मिलेगी कहाँ? "अरे ! साइकिल लेकर वह दिनभर कॉलोनी में ही दिखाई देती है, भाइना।"- कॉलोनी के गार्ड ने कहा। इन्होंने मीना को घर भेजने का प्रस्ताव दिया।

किसी ने दस्तक दी। दरवाजा खोला तो एक महिला मधुर मुस्कान लिए खड़ी थी। साँवला किंतु धूमिल सा रंग, छरहरा बदन, सूती की बेरंग साड़ी पहने हुए थी। “दीदी मूं मीरा अछी ।” (दीदी मैं मीरा हूँ।) पिछले 2 वर्षों से साइकिल से पूरे कॉलोनी के चक्कर लगाते हुए आत्मविश्वास से भरपूर एक स्त्री को हमने देखा था वो मीरा ही थी। ठंडी, गर्मी तथा बरसात, हर मौसम में उसे साइकिल से एक ब्लॉक से दूसरे ब्लॉक जाते हुए देखते थे। तब पता नहीं था कि वही मीरा है।

मीरा ने पूछा, “दीदी कण काम अछी ?” अर्थात् क्या काम है? कुछ ज्यादा नहीं, पीठ में थोड़ा दर्द है, एक महीने मालिश करनी है। यह सुनकर उसने मुझे आश्चर्य की नज़रों से देखा, शायद पूछना चाहती थी कि दिखने में मैं तो स्वस्थ ही प्रतीत हो रही हूँ फिर मालिश क्यों? क्योंकि उसे तो सभी घरेलू कार्यों के लिए ही बुलाते हैं। अपने प्रश्नों को स्वयं तक ही रख उसने कहा ठीक है दीदी मैं कब से आऊँ? उसकी स्वीकारोक्ति ही मेरे लिए काफी न थी। घर की कुशल गृहणी होने की वजह से मेरे लिए उसका उचित मेहनतना ठीक करना मेरी प्राथमिकता थी। मैंने समय ठीक करते हुए कहा कितना मेहनतना लोगी? दीदी 1500 टंका लागीब, यानी रुपए 1500/- लगेंगे। बढ़ती महँगाई ने रसोई के संतुलन को असंतुलित कर दिया था। पूरा देश इस असंतुलन में खुद को संतुलित रखने में नाकामयाब था। इधर-उधर करके मैंने 1200/- रुपए का प्रस्ताव दिया। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान ही उसके हाँ की स्वीकृति थी। मीरा से औपचारिक तौर पर मेरा यह प्रथम परिचय था। वह दिखने में कुल मिलाकर अत्यंत साधारण व्यक्तित्व वाली महिला प्रतीत हो रही थी। मैं तो इसी बात से खुश थी कि मेरा काम 1200/- रुपए में ही बन जाएगा। फाटक बंद करते ही ज़हन से मीरा का ख्याल भी चला गया। अगले दिन निश्चित समय पर मीरा आई। आँखों में हल्की-सी थकान, चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लिए मीरा ने कहा, “दीदी मोर टाइम ठीक अछी ना” (मैं ठीक समय पर आई हूँ ना)। मैंने घड़ी पर नज़र घुमाई, संध्या के 7:00 बज चुके थे और मैंने कहा 'हाँ'। पहले कि वह कुछ कहे मैं साफ कर देना चाहती थी कि मुझे अच्छे से ओड़िया नहीं आती है। इस बात को सुनकर उसने कहा “मते हिंदी भालो आसे ना” (मुझे हिंदी ठीक से नहीं आती) पर उसने बताया कि वह हिंदी समझ सकती है यह सुनकर मैं खुश हो गई क्योंकि मैं भी ओड़िया भली-भांति बोल नहीं पाती हूँ मगर समझ लेती हूँ और यहीं से हमारी जुगलबंदी प्रारंभ हुई। बातों का सफ़र चल चुका था जिसकी संगी बनकर मैं सफ़र का लुत्फ उठा रही थी। बड़ी ही सहजता और सरलता से वह अपनी बातों को मुझ तक पहुँचा रही थी। थोड़ी सी हिंदी, थोड़ी सी ओड़िया तथा उसके हाथ और आँखों के इशारे उसके बातों को पूरा कर रहे थे। अपने विचारों को दूसरे लोगों तक पहुँचाना ही तो भाषा है। माध्यम चाहे कुछ भी हो, अर्थ वाले शब्द, शुद्ध अलंकृत वाक्यों का चुनाव करने वाले स्वयं को प्रत्येक व्यक्ति के समक्ष अभिव्यक्त करने में सर्वथा सक्षम नहीं हो पाते हैं।

कॉलोनी के समस्त घरों का पूर्णत: ब्यौरा उसके पास था। वह यहाँ 20 वर्षों से कार्य कर रही है। यह बताते हुए उसने अचानक से पूछा, “दीदी मुझे देखकर आपको क्या लगता है, मेरी उम्र कितनी होगी?” मेरे कुछ कहने से पहले ही इसका उत्तर देते हुए उसने कहा, “मैं 45 वर्ष से ज्यादा की हूँ, मगर सब कहते हैं मेरी उम्र का पता ही नहीं चलता।” यह कहते-कहते वह हँस पड़ी। वाक्य के तारतम्य को आगे बढ़ाते हुए उसने मुझसे कहा, “दीदी आपको पता है मेरे 4 बच्चे हैं, पहली लड़की जो कि अब 25 वर्ष की हो चुकी है; उसकी मैंने शादी कर दी है; दूसरा लड़का जो आईटीआई कर रहा है; पढ़ने में बहुत ज्यादा अच्छा नहीं है फिर भी मैं उसे पढ़ा रही हूँ क्योंकि बिना पढ़ाई के आजकल दुनिया में नहीं चलती है; मैंने जो कष्ट झेले हैं अनपढ़ता की वजह से, मैं नहीं चाहती कि उनके साथ भी वैसा कुछ हो; तीसरी लड़की कॉलेज में है और भगवान की दया से वह पढ़ने में अच्छी है; उसकी शादी के लिए लड़के वाले आ रहे हैं मगर मैंने साफ मना कर दिया है; दीदी जब तक मेरी बेटी कॉलेज पूरा नहीं कर लेती मैं उसकी शादी नहीं करुँगी; चौथा लड़का आठवीं श्रेणी में पढ़ता है। 20 वर्षों से मैं अपना घर चला रही हूँ और बच्चों का पालन-पोषण कर रही हूँ।” एक पर एक मीरा अपने जीवन के परतों को नि:संकोच खोले जा रही थी और मैं निस्तब्ध भाव से कभी उसकी निश्छलता का तो कभी परमात्मा की कठोरता को महसूस कर रही थी। “दीदी मेरा पति अच्छा इंसान नहीं है, उसके दूसरी औरत के साथ संबंध थे तो मैंने भी उसे अपने घर से निकाल दिया।” “तो क्या वह अब कभी भी तुम लोगों से मिलने नहीं आता”, मैंने पूछा। मीरा ने कहा, “वह मिलने नहीं आता और आएगा तो भी मैं उसे घर में आने नहीं दूँगी। उसने मेरे और मेरे बच्चों के साथ जो किया वह ठीक नहीं है। उसे मैं नहीं, भगवान सजा देगा। दीदी, शायद मेरा नसीब ही खराब है इसलिए मैं कोई चिंता नहीं करती, न ही किसी बात का कोई मलाल है। दिनभर मेहनत करती हूँ। घर जाकर बच्चों के साथ पेटभर खाना खाती हूँ और चैन से सोती हूँ। किसी से माँगती नहीं, किसी का खाती नहीं। मेहनत से अपना और अपने बच्चों का पेट पालती हूँ। दीदी, चिंता करने से ढेर सारी बीमारियाँ होती हैं। खुश रहती हूँ, अपना कर्म करती हूँ। जब भगवान बुलाएँगे चली जाऊँगी।” वह एक-एक करके अपनी ज़िंदगी के पन्नों को खोलती गई। “दीदी समय हो गया है, कल मैं इसी समय आऊँगी।” इतना कहकर एक मधुर मुस्कान के साथ वह चली गई।

आज उसने मेरे समक्ष जीवन के एक नए नज़रिए का फाटक खोल दिया। कितनी आसानी से मीरा ने अपने जीवन के कठोरतम सत्य को स्वीकारा है और कितने साहस के साथ जीवन व्यतीत कर रही है। मनुष्य ही स्वयं अपने जीवन को सरल और जटिल बनाता है। मीरा का सरल व्यक्तित्व, उसकी सोच तथा जीवन जीने की रीति ही उसे विशिष्ट बनाती है। हम कितने जटिलताओं में जीते हैं या शायद अपने जीवन को जटिल बना लेते हैं और कई बार ऐसा होता है कि अपने दिल से लिए फैसले से उसे हमेशा के लिए सरलतम बना देते हैं। एक अनपढ़ व्यक्ति भी जीवन के जटिल गणित को कितनी आसानी से सुलझा सकता है। मुझे कल की प्रतीक्षा है, पुनः मीरा से मिलने की या यूँ कहूँ जीवन के कुछ और मंत्र सीखने की।

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