इसे दर्द कहो या स्वाभिमान,मैं लौट के फिर न आऊँगा!
जिजीविषा
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वो जो इक चाह
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कलम भी रोती है
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अपनी कविता में तुमको पढ़कर
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एक अलिखित कविता
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कुछ लिखते हुए
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हे कवि ! मुझे बताते रहना
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ठीक नहीं
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ठोकर तो खाकर देखिये
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शायरी के सिवा
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अंतरात्मा का न्याय
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जाग उठो हे भरत पुत्र !
1885 0
ये सफ़र भी न अज़ीब है
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पैर तो कबके थके
1618 0
साक़ी
1613 1
तुम अगर लौट कर नहीं आये
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भला कैसे होगा
कुछ तो बता ऐ जिन्दगी!
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प्यास
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कोई नहीं है बुरा धरा पर
1580 1
पीड़ा
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अप्सरा
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फ़र्जी राष्ट्रवाद
2262 1
ये तुम्हारे राग अंधे
1586 1
हवा के साथ बह जाना
1893 1
हे सखे! अब ले न चलना
1686 1
कोमल मन और कटु जीवन
1858 1
वो जो इक चाह घुटी है मन में
1550 1
है रात से मेरा प्रेम पुराना
1842 1
इनमे बात तो कुछ है
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हो के रुसवा तेरी निगाहों में
1622 1
तलाक़
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तो रहने दो
1637 1
विरहन
1542 1
मरघट का अट्टाहास
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क्या छुपाएँ-क्या बताएँ
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अजन्मा सच
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कब किस का होता है!
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रिन्द का फ़लसफ़ा
1577 0
अहो भाग्य!
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तुझसे छुपाने क्या-क्या!
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अश्रुओं में क्षार कैसे आ गया
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ऐसा उसके हाथों को छूकर लगता है!
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अल्हड़ कवि
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आखिर मान लूँ कैसे?
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हद करते हो!
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सोच लेना ऐ भँवरे!
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अनिर्णीत भाव
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प्यास के उस छोर पर
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एक स्वप्न : परिवर्तन के बीज
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नागफनी का पौधा
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